साजिश रचने वाले अफसरों की टोली में धामी के नाम से हो रही ‘धुकधुक’

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही देखने में आता रहा है कि शासन-प्रशासन व पुलिस अफसरों की कुछ चौकडी चंद राजनीतिक दलों की परिक्रमा करती रही है और अपने राजनीतिक आकाओं के बल पर वह मलाईदार तैनाती पाने में सफल भी होती रही है लेकिन अब तो हद यहां तक हो गई कि मौजूदा कार्यवाहक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को खटीमा में चुनाव हरवाने के लिए कांग्रेस के एक दो बडे नेताओं के दुलारे बनने वाले चंद आईएएस, आईपीएस व सूचना विभाग के एक दो अफसरों ने साजिश का ऐसा बडा चक्रव्यूह रचा कि पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गये लेकिन वह राज्य में कांग्रेस को चारो खाने चित कर गये जिसके चलते राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाये जाने का सपना देखने वाले अफसरों की टोली की नींद उड गई और अब जिस तरह से मुख्यमंत्री के रूप में पुष्कर सिंह धामी का नाम रेस में सबसे आगे लिया जा रहा है उससे उन साजिशकर्ता अफसरों की टोली में धुकधुक मची हुई है जो सरकार के मुखिया के खिलाफ ही पर्दे के पीछे से बगावत का झंडा इसलिए उठाये हुये थे क्योंकि पुष्कर सिंह धामी ने अपने कार्यकाल में राज्य को पारदर्शिता से चलाने का संकल्प लिया था और यही कारण था कि भ्रष्टाचार के दलदल में गोते लगाने वाले अफसरों की टोली की आंखों में पुष्कर सिंह धामी खटकने लगे थे? उत्तराखण्ड के अन्दर अब एक बहस चल रही है कि अगर अफसरों की टोली राजनीतिक लोगों के हाथों में खेलकर मुख्यमंत्री को चुनाव हरवाने का ताना-बाना बुन सकती है तो ऐसे अफसर उत्तराखण्ड के लिए एक अभिशाप से ज्यादा कुछ नहीं है और ऐसे अफसरों पर नई सरकार को बडी नकेल लगाने के लिए आगे आना पडेगा जिससे कि राज्य ऐसे अफसरों की साजिशों का शिकार न हो सके?
उत्तराखण्ड में शासन-प्रशासन व पुलिस के काफी अफसरों को कांग्रेस व भाजपा के कुछ नेताओं की परिक्रमा करते हुए हमेशा देखा गया और नेताओं की इस परिक्रमा के चलते ही काफी अफसरों को हमेशा महत्वपूर्ण तैनाती मिलती रही। उत्तराखण्ड में भाजपा की प्रचंड बहुमत सरकार में साढे चार साल तक राज्य के कुछ आईएएस, आईपीएस व सूचना के एक-दो अफसर अपने आपको प्रदेश का सम्राट समझते रहे और उन्होंने राज्य की जनता को जिस तरह से हाशिये पर रखा वह किसी से छुपा नहीं रहा। त्रिवेन्द्र शासनकाल में तो राजधानी के पूर्व पुलिस कप्तान रहे अरूण मोहन जोशी ने सरकार के इशारे पर कुछ पत्रकारों के खिलाफ फर्जी राजद्रोह का मुकदमा लिखने से भी गुरेज नहीं किया और एक पत्रकार को जबरन इस मामले में चंद घंटों की जांच के बाद ही शामिल किया गया और उसके बाद उसे घर से रात्रि में पुलिस की बडी टीम ने ऐसे उठाया जैसे उस पत्रकार ने न जाने राज्य को दो भागों में बांटने के लिए कोई साजिश रची हो या फिर उसने ऐसा राज्य विरोधी कोई काम कर दिया हो जिसके चलते आतंकवादियों के तरह उसे जबरन यातनायें दी गई। पत्रकार को यातनायें देने में अरूण मोहन जोशी पहले पायेदान पर था और वह पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिए लिखी गई खबरों को लेकर ऐसे आवेश में था कि मानो पत्रकार ने कोई खबर नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री को कितना बडा नुकसान पहुंचाने की साजिश रची हो। अरूण मोहन जोशी ने थाने में पत्रकार को पिटवाने और खुद पिटने का जो तांडव रचा उससे साफ झलक गया था कि कुर्सी पर टिके रहने के लिए अफसर किस तरह से चंद राजनेताओं के गुलाम बन चुके हैं? पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें कायम तो एक छोटी सी साजिश ही मानी जा सकती है क्योंकि जब अफसरों की एक टोली राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को चुनाव हरवाने के लिए बडी साजिश रच सकती है तो ऐसे अफसरों के हाथों में राज्य कैसे सुरक्षित रह सकता है इसका अंदाजा अपने आप लगाया जा सकता है? उत्तराखण्ड के अन्दर साजिशों का खेल खेल चुके कुछ अफसरों की एक टोली को जबसे इस बात की भनक लगी है कि उत्तराखण्ड में एक बार फिर भगवा रंग फहराने वाले पुष्कर सिंह धामी को राज्य का एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है तो साजिशों का खेल खेलने वाले ऐसे अफसरों के मन में अब धुकधुक मची हुई है?

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