72 घंटे नेताओं की उडे़गी नींद

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किरन शर्मा
देहरादून। उत्तराखण्ड में पांच साल सत्ता पर कौन राज करेगा इसको लेकर सिर्फ 72 घंटे बचे हैं और इन 72 घंटों में राजनेताओं की नींद उडने लगी है। ईवीएम के खुलने के बाद किस राजनेता को पांच साल विधायक बनने का आशीर्वाद जनता ने दिया है यह साफ हो जायेगा और किन राजनेताओं को जनता ने नकार कर उन्हें विधायक न बनने देने के लिए अपना मतदान किया था उसका भी सच सबके सामने आ जायेगा। कुल मिलाकर कहा जाये तो राजनेताओं के राजनीतिक भविष्य का काउंन डाऊन शुरू हो गया है और सभी राजनेता अपनी जीत को लेकर गुणा-भाग के जोड तोड में जुटे हुये हैं जिससे उनके दिल धक-धक करने लगे हैं।
उल्लेखनीय है कि भाजपा सरकार का साढे चार साल का कार्यकाल गर्त में चला गया और सिर्फ छह माह के कार्यकाल में पुष्कर सिंह धामी जितना करिश्मा अपनी नम्रता से सत्ता चलाने में कर सकते थे वह उन्होंने किया और रात-दिन उन्होंने भाजपा की सत्ता में वापसी को लेकर अपने कदम आगे बढाकर रखे। यह भी साफ है कि भाजपा के एक दर्जन बडे राजनेता पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखकर हर पल बेचैन रहते थे और उनके मन में सिर्फ एक भय बना हुआ था कि अगर पुष्कर सिंह धामी को एक बार फिर राज्य का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला तो उससे उनका राजनीतिक भविष्य अंधकारमय हो जायेगा? यही कारण है कि पुष्कर सिंह धामी को राज्य में हुये विधानसभा चुनाव में कमजोर करने के लिए कुछ राजनेताओं ने भीतरघात का खेल पार्टी के ही काफी प्रत्याशियों के साथ इसलिए खेला कि अगर भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिला और उसे सरकार बनाने के लिए कुछ निर्दलीय व किसी अन्य राजनीतिक दल के विधायकों की जरूरत पडी तो सरकार बनाकर मुख्यमंत्री के रूप में किसी और राजनेता को सत्ता की चाबी सौंप दी जाये? हालांकि पुष्कर सिंह धामी राजनीति के वो अभिमन्यु हैं जो अपनों द्वारा बिछाये गये चक्रव्यूह को भेदकर उन्हें अपनी चाणक्य नीति से धूल चटा दें? फिलहाल चुनाव परिणाम के एक्जिट पोल का पिटारा खुलने से पहले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विजयवर्गीय ने जिस तरह से दून में डेरा डालकर सरकार बनाने के लिए सीक्रेट प्लान तैयार करना शुरू किया है उससे राज्य की राजनीति में एकाएक गर्माहट दिखाई दे रही है?
नया सप्ताह प्रारंभ हो चुका है नयी इबारत लिखने के लिए क्योंकि तीन दिन बाद राज्य के सूरमाओं की परीक्षा के परिणाम आने है। कौन किस पर भारी ये तो दस मार्च को ही मालूम चलेगा लेकिन इस सप्ताह बहुत से सूरमाओं को अपने अपने बचाव में अनर्गल बयां करते हुए सुना जायेगा। लेकिन राज्य का युवा व मातृशक्ति अपने बेटे की जीत पर पूरी तरह से आश्वस्त है। ये बेटा ओर कोई नहीं राज्य के युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिह धामी ही है जो छरू,सात माह में ही मातृशक्ति व युवाओ के दिलो की धडकनें बन गये। पुष्कर सिह धामी ने सभी के हितों की बात की व उन्हें स्तर से मौको पर ही निबटने का साहस किया। ये साहस राज्य के बडे नेता नही कर पाये। सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में लगे हरक सिंह रावत को पार्टी से चलता कर साफ संदेश दिया कि पार्टी से बडा कुछ नहीं है। राज्य में जो आंदोलन की सुगबुहाहट शुरू हो रही थी उस पर भी पूर्णत: समाधान कर आंदोलन कारियों की वाहवाही अपने पाले में की। आज राज्य में बेशक हरदा बहुत बडे चाणक्य हो सकते है लेकिन धामी की मधुर वाणी व मुस्कान के आगे स्वयं हरदा भी बेबस नजर आते है। गुरूवार को नतीजों के बाद धामी की राजनीति किस ओर इशारा करती है। यह देखने लायक होगी क्योंकि जब सत्ता संभाली तबसे वे हर किसी के दिलो के राजा बन गये है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन पर फिर से भरोसा कर राज्य की सत्ता सौंपेंगे जनता को पूर्णत: विश्वास है। जब धामी को राज्य की बागडोर मिली तो उस समय राज्य के कद्दावर नेताओं को भी साफ संदेश दिया कि जिस पर मोदी,शाह का आर्शीवाद वही राज्य का मुखिया के साथ मे मुख्यमंत्री बनने की चाह रखने वाले हाशिये पर लटकते नजर आने लगे थे।

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