भाजपा में पक रही खिचड़ी!

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देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर वह धड़ा सक्रिय हो गया है। जो भाजपा को साढ़े चार वर्ष तक हिचकोले दिलाता रहा? कल देर रात तक चली इस तिकड़ी की बैठक के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। पिछले साढें चार वर्ष तक इस तिकड़ी ने जिस प्रकार भाजपा की सत्ता का संचालन किया। उससे राज्य का आम नागरिक तो हलकान हुआ ही था। उससे कहीं ज्यादा भारतीय जनता पार्टी का एक-एक कार्यकर्ता भी अपने को असहज महसूस करने लगा था। जिसके कारण भाजपा हाईकमान ने चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री बदलने का बड़ा रिस्क लिया था। वो रिस्क कितना कामयाब रहता है इसका तो पता 1० मार्च को ही चलेगा लेकिन लगभग छह माह पार्टी को चुनावी युद्ध के लिए तैयार करने के लायक जो बन गया था। अब एक बार फिर यह तिकड़ी अपने सत्ता स्वार्थ के लिए बैठकों का दौर चला चुकी है? राज्यवासियों को अच्छे से याद है कि इस उत्तराखंड का इतिहास रहा है कि भाजपा हो या कांग्रेस दोनों के मुख्यमंत्री चेहरा चुनाव में जो भी रहा हो। उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा है। इस बार भी राज्य यह मिथक तोड़ पाता है यह अभी भविष्य के गर्भ में है?
उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी हो या उनके बाद भगत सिंह कोश्यारी या कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी ओर हरीश रावत कोई भी चेहरा चुनाव में जाने के बाद सफल नहीं हुआ। यहां तक की स्वस्थ ईमानदार छवि के गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी के नाम पर नारे पर 2०12 का चुनाव लडऩे वाली भाजपा जिसने नारा दिया था ‘खंडूरी है जरूरीÓ उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ा था। अब एक बार पुन: राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में अपना बहुत छोटा कार्यकाल प्रदर्शित करने वाले पुष्कर सिंह धामी अपनी जीत की हैट्रिक लगाकर इस राज्य के मिथक को तोड़ पाएंगे। ऐसा इस तिकड़ी की बैठकों के बाद मुश्किल दिखता लग रहा है? इस प्रकार की परिस्थितियां संदेश दे रही हैं। जिस बात का जिक्र हमने अपने पूर्व के लेख में भी किया है। पुष्कर सिंह धामी को हराने के लिए भाजपा के कई दिग्गजों ने बड़ा भितरघात किया? इसके साथ-साथ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समर्थक विधायकों को हराने का आरोप सीधे प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर भी लग चुका है। कहा तो यह तक जाता है कि सबसे सुरक्षित खेल खेल रहे भाजपा के दो-तीन दिन नेता अंदरखाने बड़ा खेल करने जा रहे हैं? एक अन्य विषय चर्चा का केंद्र बना है। जब हरीश रावत की टिप्पणी पर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपनी अनभिज्ञता जताते हुए उन्हें अपना बड़ा भाई का कह दिया है। यह सब संकेत राज्य की कूटनीतिक राजनीति की ओर इशारा कर रही है। लड़ाई एक ओर कुमाऊं व गढ़वाल के भी बीच में चल रही है। भाजपा ऐसा मानती है की कुमाऊं से कांग्रेस बढ़त ले रही है तो गढ़वाल से भाजपा बढ़त ले रही है? ऐसे में भाजपा अगर सरकार बनाती है तो मुख्यमंत्री गढ़वाल का हो। उसी की दावेदारी मजबूत मानी जाए? भाजपा अलग-अलग धड़ो में बैठकर सत्ता की कुर्सी को पाने के लिए हर नये खेल की तस्वीर राज्य के सामने रख सकती है? इसके अलावा भाजपा का एक और चेहरा सार्वजनिक है कि अभी तक जिन भी मुख्यमंत्रियों के चेहरे पर भाजपा ने चुनाव लड़ा उन को हराने का काम भी भाजपा के दिग्गजों ने ही किया। इस राज्य के अंदर मुख्यमंत्री बदलने के लिए भी भारतीय जनता पार्टी की घड़े बंदी ने ही नीव रखी। एकमात्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी ही अपने कार्यकाल को पूरा कर पाए। जबकि भाजपा ने राज्य की पहली सरकार बनने के बाद से ही इस राज्य में अपने मुखिया को जबरन कुर्सी से उतारने की परंपरा रखी। भगत सिंह कोश्यारी की जिद को दरकिनार करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने अपने साथी नित्यानंद स्वामी को इस राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन चंद माह में ही भगत सिंह कोश्यारी की जिद और पहाड़ बनाम मैदान की लड़ाई को चौड़ा करते हुए जबरन मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली थी। जबकि परिणाम यह रहा कि भगत सिंह कोश्यारी सहित भाजपा के तमाम दिग्गज हार गए और सत्ता कांग्रेस पार्टी के हाथ में चली गई यही हालात 2०12 में भी हो गए जब ‘खंडूरी है जरूरीÓ का नारा दिया गया। पहले तो कोश्यारी के धड़ेे ने ही भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्यमंत्री से हटने पर मजबूर किया और उसके भी मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार भगत सिंह कोश्यारी को कुर्सी नहीं मिली? इस सबके बाद कोश्यारी को दरकिनार कर युवा चेहरे डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को बागडोर दे दी गई लेकिन वह भी भगत सिंह कोश्यारी को यह रास ना आया। एक बार पुन: खंडूरी को बागडोर दे दी लेकिन सत्ता के लिए 36 विधायकों वाली पार्टी को 35 विधायक तो मिल गए ओर एक मात्र भुवन चंद्र खंडूरी मुख्यमंत्री का चेहरा होते हुए भी हार गए। तब भी यह बात सामने आई थी कि खंडूरी को हराने में भाजपा के ही दिग्गजों की भूमिका थी। आज एक बार फिर भगत सिंह कोश्यारी के सबसे करीबी नेता पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लड़ा गया 2०22 का चुनाव कहीं भाजपा के ख्वाबों को चूर ना कर दे क्योंकि जो खबरें आ रही हैं, जो तस्वीरें दिख रही हैं। उससे साफ लगता है की पुष्कर सिंह धामी के लिए सत्ता का मुखिया बनना उनके लिए कांटों पर चलने के समान दिखाई दे रहा है क्योंकि पार्टी के ही कुछ नेता उन्हें सत्ता मिलने के बाद से ही अपने नेता के रूप में सहन नहीं कर पा रहे थे? अब सवाल खडे हो रहे हैं कि यह तिकड़ी क्या गुल खिलाती है यह अभी 1० मार्च के करीब आते आते हैं ओर भी स्पष्ट हो जाएगा?

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