सत्ता का सपना देखने वाली कांग्रेस ने सहसपुर में अपनों से टकराव

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2027 से पहले कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई तेज
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती अपने ही नेताओं और समर्थकों के बीच तालमेल बनाए रखने की है। सहसपुर विधानसभा क्षेत्र में हरक सिंह रावत और आरेन्द्र शर्मा के समर्थकों के बीच कथित टकराव ने पार्टी के भीतर टिकट की दावेदारी और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
कांग्रेस एक ओर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर सहसपुर में सामने आ रही अंदरूनी खींचतान संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर रही है। हरक सिंह रावत की सहसपुर से संभावित चुनावी दावेदारी और आरेन्द्र शर्मा के समर्थकों की राजनीतिक सक्रियता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस सीट पर कांग्रेस किस तरह आम सहमति बना पाएगी? राजनीतिक दृष्टि से सहसपुर का यह विवाद केवल दो नेताओं के समर्थकों के बीच मतभेद तक सीमित नहीं है। टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और संगठन में प्रभाव जैसे सवाल भी इससे जुड़े हैं। यदि इन मुद्दों पर समय रहते स्पष्टता नहीं आई तो चुनावी तैयारियों के दौरान पार्टी नेतृत्व को असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
23 अक्टूबर को सेलाकुई में हुई न्याय यात्रा के दौरान दोनों नेताओं के समर्थकों की नारेबाजी इतनी बढ़ी कि वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह को हस्तक्षेप करना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, हरक सिंह रावत कार्यक्रम से पहले ही रवाना हो गए, जबकि आर्येंद्र शर्मा के समर्थकों के साथ न्याय यात्रा आगे बढ़ी। इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि आर्येंद्र शर्मा पहले सहसपुर से दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और फिर टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। दूसरी ओर हरक सिंह रावत भी इसी सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और कार्यकर्ताओं की भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। हालांकि कांग्रेस न्याय यात्रा के जरिए भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रही है, लेकिन सहसपुर की घटना ने उसके संगठनात्मक अनुशासन को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सवाल यह है कि कांग्रेस हाईकमान सहसपुर में टिकट की दावेदारी को लेकर उभरे मतभेद कैसे सुलझाएगा? क्या हरक सिंह रावत और आर्येंद्र शर्मा एक साझा राजनीतिक मंच पर सहमति बना पाएंगे, या चुनावी तैयारियों के बीच समर्थकों की यह खींचतान आगे भी दिखाई देगी?

धामी की घेराबंदी में उलझी कांग्रेस
देहरादून। उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सभी जनपदों में विकास का जो नया अध्याय लिखा है उसके चलते वह आश्वस्त हैं कि उत्तराखण्ड के अन्दर एक बार फिर तीसरी बार भाजपा की सरकार सत्ता में आयेगी। मुख्यमंत्री ने सरकार और संगठन को साथ लेकर चलने का जो जज्बा दिखा रखा है उससे कांग्रेस के अन्दर एक बडी बेचैनी देखने को मिलती आ रही है। कांग्रेस में गली मौहल्ले के काफी नेता भी विधायक बनने का सपना देखने लगे हैं और उनमें यह आशा बंधी हुई है कि उन्हें पार्टी विधायक का टिकट दे दे इसके लिए वह खुद ही अपने इलाकों में अपने आपको विधायक का दावेदार बताने का खूब भोपू बजा रहे हैं जिससे साफ नजर आ रहा है कि कांग्रेस में टिकट दावेदारों की अभी से ही एक बड़ी फौज खडी हुई है।
उत्तराखण्ड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का बाजार गर्म होने लगा है। एक तरफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विकास कार्यों, प्रशासनिक फैसलों और सरकार-संगठन के बीच तालमेल के सहारे भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर टिकट की दावेदारी को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। हालात ऐसे हैं कि चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही कई विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवार अपनी दावेदारी का बिगुल बजाने लगे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा अपने विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं को चुनावी ताकत बनाने की तैयारी में है। धामी सरकार प्रदेश के विभिन्न जनपदों में किए गए विकास कार्यों को जनता के सामने रख रही है। मुख्यमंत्री का सरकार और संगठन के बीच सामंजस्य बनाए रखने का प्रयास भी भाजपा की चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा के सामने जहां सत्ता में वापसी की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के सामने सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ अपने नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साधने की भी बड़ी परीक्षा खड़ी है। कांग्रेस के भीतर सबसे दिलचस्प तस्वीर उन विधानसभा क्षेत्रों में दिखाई दे रही है, जहां स्थानीय स्तर के कई नेता अभी से स्वयं को विधायक पद का मजबूत दावेदार बताने लगे हैं। कोई जनसंपर्क के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहा है, तो कोई सोशल मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी दावेदारी को हवा दे रहा है। टिकट मिलने से पहले ही राजनीतिक प्रचार की इस होड़ ने कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि चुनाव के समय पार्टी इन तमाम महत्वाकांक्षाओं को एकजुट कैसे रख पाएगी?

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