डिजिटल हुई फाइल जवाबदेही कब होगी डिजिटल?
किस अफसर के पास कितने दिन रही, रिकार्ड हो सार्वजनिक
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। मुख्यमंत्री ने 1905 की समीक्षा में दो टूक कहा था कि शिकायत दर्ज कराकर समाधान का इंतजार करने वाली जनता की आवाज अब फाइलों में दबाकर नहीं रखी जा सकेगी। मुख्यमंत्री ने यह भी साफ संदेश दिया कि समस्या का समाधान तय समय में धरातल पर दिखना चाहिए वरना जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही तय होगी। अब राज्य के अन्दर यह बहस भी उठी है कि फाइल किस अफसर की टेबल पर कितने दिन दबी रही इसका रिकार्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए। ई ऑफिस सिर्फ कागज बचाने के लिए नहीं जवाबदेही तय करने के लिए भी हो और पांच दिन की फाइल तीस दिन तक रोकने वाले अफसर का रिकार्ड भी सामने आये जिससे कि सरकार के मुखिया उससे यह जवाब मांग सके कि आखिर उन्होंने किस उद्देश्य से फाइलों को अपनी टेबल पर अटकाकर रखा हुआ था। मुख्यमंत्री के अल्टीमेटम से साफ है कि अब यह खेल नहीं चलेगा कि फाइल प्रक्रिया मे है क्योंकि मुख्यमंत्री ने ऐसा करने वाले अफसरों को अब अपनी रडार पर लेने का मन बना लिया है।
उत्तराखंड में सरकारी कामकाज तेजी से डिजिटल हो रहा है। ई-ऑफिस की व्यवस्था है, ऑनलाइन आवेदन हैं, पोर्टल हैं और समयबद्ध निस्तारण के दावे भी हैं। फिर एक सामान्य नागरिक को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं कि उसकी फाइल इस समय किस स्तर पर है, किस अधिकारी के पास है और वहां कितने दिन से रुकी हुई है? सरकारी दफ्तरों में सबसे पुराना जवाब है “फाइल अभी प्रक्रिया में है।” लेकिन यह ‘प्रक्रिया’ आखिर है क्या? फाइल पांच दिन एक टेबल पर पड़ी रही या 30 दिन, किस अधिकारी ने समय पर टिप्पणी नहीं की, किस स्तर पर निर्णय अटका और किसने आगे बढ़ाने में देरी की यदि ई-ऑफिस यह सब रिकॉर्ड करता है तो उसका जरूरी हिस्सा आवेदक को दिखाई क्यों नहीं देना चाहिए? सिर्फ कागज की फाइल को कंप्यूटर की स्क्रीन पर पहुंचा देना प्रशासनिक सुधार नहीं है। असली सुधार तब होगा जब तकनीक यह भी बताए कि देरी कहां हुई और उसके लिए जिम्मेदार कौन है। हर आवेदन के साथ एक ‘फाइल एजिंग मीटर’ होना चाहिए। आवेदन जमा होने से लेकर अंतिम निर्णय तक पूरा टाइमलाइन रिकॉर्ड आवेदक देख सके। किस स्तर पर फाइल पहुंची, कब देखी गई, कितने समय में आगे बढ़नी थी और वास्तव में कितने दिन लगे यह जानकारी छिपी क्यों रहे?
नागरिक से आवेदन में एक दस्तावेज कम हो तो आपत्ति लग जाती है। शुल्क जमा करने की तारीख तय है, अपील की अवधि तय है और प्रमाणपत्रों की वैधता भी तय है। फिर सरकारी टेबल पर फाइल रोकने की समयसीमा क्यों दिखाई नहीं देती? यदि किसी अधिकारी को फाइल तीन दिन में आगे बढ़ानी थी और उसने उसे 20 दिन रोके रखा तो सिस्टम अपने आप जवाब मांगे। तय सीमा पार होते ही फाइल लाल निशान के साथ उच्चाधिकारी के डैशबोर्ड पर पहुंचे। बार-बार देरी करने वाले अधिकारियों का रिकॉर्ड उनकी कार्यप्रणाली के मूल्यांकन में शामिल हो। आम आदमी को यह बताना कि उसका आवेदन ‘लंबित’ है, आधी जानकारी है। असली पारदर्शिता यह होगी कि पोर्टल बताए लंबित कहां है, कब से है और अगली कार्रवाई की अंतिम तारीख क्या है। इससे नागरिक को बाबू से लेकर अधिकारी तक के कमरों के चक्कर लगाने की जरूरत कम होगी। फोन, सिफारिश और ‘फाइल आगे बढ़वाने’ की संस्कृति पर भी चोट पड़ेगी।
डिजिटल शासन का अर्थ केवल आवेदन ऑनलाइन लेना नहीं हो सकता। यदि तकनीक यह रिकॉर्ड कर सकती है कि फाइल किस अधिकारी के पास कब पहुंची और कब आगे बढ़ी, तो यही रिकॉर्ड प्रशासनिक जवाबदेही का सबसे मजबूत हथियार बन सकता है। सरकार को व्यवस्था ऐसी करनी चाहिए कि फाइल की पूरी यात्रा नागरिक देख सके। फाइल पांच दिन रुके या पचास दिन सिस्टम बताए कि वह किस स्तर पर अटकी। क्योंकि सरकारी दफ्तर में फाइल कोई लावारिस कागज नहीं होती। उसके पीछे किसी की पेंशन, किसी का प्रमाणपत्र, किसी की जमीन, किसी की अनुमति, किसी का रोजगार और कभी-कभी किसी परिवार की पूरी उम्मीद अटकी होती है। ई-ऑफिस है तो फाइल की रफ्तार भी दिखनी चाहिए और उसे रोकने वाले स्तर की जवाबदेही भी। तभी डिजिटल प्रशासन का मतलब स्क्रीन पर फाइल नहीं, सिस्टम में जवाबदेही होगा।