ओवररेटिंग का खेल पुराना

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छापे पड़ते रहे, ओवररेटिंग चलती रही
अब डीएम के छापे में गड़बडी का खेल बेनकाब
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही राज्य के अधिकांश जनपदों मंे शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग और अनियमितताओं की शिकायतें हमेशा शासन से लेकर प्रशासन के पास पहुंचती आ रही हैं लेकिन उसके बावजूद भी राज्य के अन्दर ओवररेटिंग का काला धंधा बंद नहीं हो पा रहा है। हैरानी वाली बात तो यह है कि जब उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी दून में अकसर कुछ शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग को लेकर भूचाल मचता है तो आबकारी महकमा कुछ हरकत में आता है लेकिन कार्यवाही के नाम पर जिस तरह से कोई बडा चाबुक नहीं चलता उससे ओवररेटिंग का काला धंधा बंद होने का नाम नहीं ले रहा है। राजधानी के डीएम के आदेश पर अफसरों ने शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग को लेकर चौकिंग अभियान चलाया और एक दुकान में रखी चार दर्जन बोतलों के बेच नम्बर उपलब्ध अभिलेखों से मेल नहीं खाये तो कहीं दुकानों पर स्टॉक रजिस्टर अपडेट नहीं मिला तो कई सेल्समैन अनाधिकृत रूप से ठेकों में काम करते हुए पाये गये। जांच के दौरान ओवररेटिंग के मामले सामने आये हैं लेकिन सवाल यह है कि आखिरकार ओवररेटिंग करने वाले दुकानदारों के मन में शासन और सिस्टम का डर क्यों नहीं है जिसके चलते वह ओवररेटिंग करने का खुलकर तांडव कर रहे हैं। वहीं डीएम के आदेश पर खुलीं अनियमितताओं की परतेंय कहीं बैच नंबर का हिसाब नहीं, कहीं स्टॉक रजिस्टर अधूरा तो कहीं अनधिकृत सेल्समैन नजर आये तो समझा जा सकता है कि शराब ठेकों में क्या खेल चल रहा है?
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग और दूसरी अनियमितताओं की शिकायतें शासन से लेकर प्रशासन तक पहुंचती रही हैं। समय-समय पर छापेमारी हुई, चालान हुए और कार्रवाई के दावे भी किए गए, लेकिन बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है आखिर शराब की दुकानों पर निर्धारित कीमत से अधिक वसूली का खेल खत्म क्यों नहीं हो पा रहा? राजधानी देहरादून में जब ओवररेटिंग की शिकायतें जोर पकड़ती हैं तो आबकारी महकमा हरकत में दिखाई देता है। जांच और कार्रवाई भी होती है, लेकिन इसके बावजूद यदि वही शिकायतें बार-बार सामने आती हैं तो सवाल केवल शराब कारोबारियों पर नहीं, बल्कि उस निगरानी व्यवस्था पर भी उठता है जिसके कंधों पर नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के निर्देश पर प्रशासन की अलग-अलग टीमों ने शराब की दुकानों पर छापेमारी की तो कई तरह की अनियमितताएं सामने आईं। जांच के दौरान एक दुकान में रखी करीब चार दर्जन बोतलों के बैच नंबर उपलब्ध अभिलेखों से मेल नहीं खाने की बात सामने आई। कहीं स्टॉक रजिस्टर अपडेट नहीं मिला तो कहीं अनधिकृत सेल्समैन दुकान पर काम करते पाए गए। रेट लिस्ट और ओवररेटिंग से जुड़ी शिकायतों की भी जांच की गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शराब की दुकान चलाने वाले नियम तोड़ने का जोखिम आखिर बार-बार क्यों उठाते हैं? क्या उन्हें कार्रवाई का पर्याप्त भय नहीं है? यदि निरीक्षण और निगरानी लगातार प्रभावी है तो ओवररेटिंग की शिकायतें बार-बार क्यों सामने आती हैं? यहां सवाल किसी एक दुकान का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें उपभोक्ता से निर्धारित मूल्य से अधिक पैसा लेने की शिकायत सामने आने के बावजूद यह प्रवृत्ति पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी। ओवररेटिंग पर यदि केवल चेतावनी, सीमित जुर्माने अथवा औपचारिक कार्रवाई तक मामला सिमटता रहेगा तो क्या इसका स्थायी असर पड़ेगा? गंभीर और बार-बार नियम तोड़ने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ लाइसेंस की शर्तों के तहत कठोर कार्रवाई और नियमित निगरानी ही ऐसा संदेश दे सकती है कि नियम तोड़ना फायदे का सौदा नहीं है।
डीएम के निर्देश पर हुई कार्रवाई ने एक बार फिर व्यवस्था के सामने आईना रख दिया है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि छापेमारी में मिली अनियमितताओं पर आगे क्या कार्रवाई होती है और जिम्मेदारी कहां तक तय की जाती है। सवाल सीधा है जब शासन के नियम स्पष्ट हैं, कीमत तय है और निगरानी के लिए पूरा आबकारी तंत्र मौजूद है, तो फिर शराब की दुकानों पर ओवररेटिंग करने वालों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? छापे की खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण अब कार्रवाई का नतीजा होगा क्योंकि ओवररेटिंग रोकनी है तो दुकानों पर दस्तक के साथ नियम तोड़ने वालों के मन में कानून का डर भी दिखाई देना चाहिए।

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