एससी, एसटी प्रमाण पत्रों में महाघोटाला
सीएम एसआईटी गठित कर करायें जांच
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच अभी चर्चा में है, लेकिन अब एक ऐसी मांग उठी है जो स्वीकार हुई तो पुरानी तहसीली फाइलों से लेकर सरकारी महकमों में वर्षों पहले हुई नियुक्तियों तक हलचल पैदा कर सकती है। अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने एसी,एसटी और ओबीसी प्रमाणपत्रों की भी एसआईटी जांच की मांग कर सरकार के सामने ऐसा सवाल रख दिया है, जिसका जवाब महज यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि प्रमाणपत्र सक्षम अधिकारी ने जारी किया था। अधिवक्ता ने यहां तक आशंका जताई है कि अगर सरकार के मुखिया एससी, एसटी प्रमाण पत्रों की बडी जांच कराने को हरी झंडी देते हैं तो यह प्रमाण पत्र एक बडा महाघोटाला सामने आ सकता है। इसलिए जब प्रमाण पत्रों की जांच कराने का दौर शुरू हो रहा है तो फिर एससी, एसटी प्रमाण पत्रों की जांच कराने के लिए सरकार और शासन कोई बडा मास्टर स्ट्रोक क्यों नहीं खेल रहे यह अभी एक रहस्य ही बना हुआ है।
सवाल प्रमाणपत्र का नहीं, उसके सहारे मिले हक का है। अगर किसी अपात्र व्यक्ति तक आरक्षण का प्रमाणपत्र पहुंचा और उसी प्रमाणपत्र ने उसे सरकारी नौकरी, मेडिकल-इंजीनियरिंग की आरक्षित सीट या छात्रवृत्ति तक पहुंचा दिया तो कहानी वहीं खत्म नहीं होती। कहानी वहां से शुरू होती है। क्योंकि उस लाभ के दूसरी तरफ कोई ऐसा पात्र अभ्यर्थी भी हो सकता है, जिसका नंबर उस समय पीछे रह गया। नेगी ने इसी पूरी कड़ी को खोलने की मांग की है। उनका कहना है कि 28 नवंबर 2000 के बाद जारी संदिग्ध एससी-एसटी प्रमाणपत्रों की फाइलें निकाली जाएं। देखा जाए कि प्रमाणपत्र किस जाति अथवा जनजाति की किस संवैधानिक प्रविष्टि के आधार पर जारी हुआ। आवेदन में क्या दस्तावेज लगाए गए, सत्यापन किसने किया और अंतिम मुहर किस अधिकारी ने लगाई। यानी अगर फाइल खुले तो सिर्फ प्रमाणपत्र धारक नहीं उसे प्रमाणपत्र तक पहुंचाने वाली सरकारी व्यवस्था भी जांच के सामने खड़ी हो।
नेगी ने लोहार और बढ़ई समुदाय से जुड़े प्रमाणपत्रों पर भी सरकार से स्थिति साफ करने की मांग की है। उनका कहना है कि जिन मामलों में एससी प्रमाणपत्र जारी किए गए, वहां यह रिकॉर्ड सामने आना चाहिए कि प्रमाणपत्र संबंधित राष्ट्रपति आदेश की किस प्रविष्टि और किन मूल दस्तावेजों के आधार पर दिया गया। हालांकि ओबीसी सूची में किसी नाम की मौजूदगी अपने आप किसी व्यक्तिगत एससी प्रमाणपत्र को गलत साबित नहीं करती। इसलिए फैसला आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड और लागू सूची के मिलान से होना चाहिए। जौनसारी प्रमाणपत्रों पर भी पात्रता आधारित जांच की मांग उठाई गई है। यहां सवाल पूरे जौनसारी समुदाय की एसटी मान्यता पर नहीं है। सवाल यह है कि जौनसारी के नाम पर प्रमाणपत्र जिस व्यक्ति को मिला, क्या वह वास्तव में उसका पात्र था? जहां शिकायत है, वहां मूल अभिलेख सामने आने चाहिए। लेकिन असली भूचाल तब खड़ा होगा यदि किसी प्रमाणपत्र की अपात्रता विधिक जांच में साबित होती है। फिर सवाल केवल उसे रद्द करने का नहीं रहेगा। उससे मिली नौकरी का क्या होगा? उससे हासिल आरक्षित सीट का क्या होगा? छात्रवृत्ति का क्या होगा? और सबसे बढ़कर उस समय पीछे रह गए वास्तविक पात्र अभ्यर्थी का क्या होगा?
नेगी चाहते हैं कि एसआईटी की जांच प्रमाणपत्र से शुरू होकर उसके आधार पर लिए गए प्रत्येक सरकारी लाभ तक पहुंचे। साथ ही प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय हो। यदि रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिलती है तो यह भी देखा जाए कि मामला गलत दस्तावेज देने तक सीमित था या सत्यापन और प्रमाणपत्र जारी करने की सरकारी प्रक्रिया में भी कहीं गंभीर चूक हुई। नेगी ने इससे जुड़े न्यायिक मामलों में केंद्र और राज्य की ओर से दाखिल शपथपत्र और सरकारी आदेश भी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि अदालत में विचाराधीन मुद्दों पर फैसला सुनाने के बजाय सरकार दस्तावेज सामने रखे और कानूनी स्थिति साफ करे। अब निगाह सरकार पर है। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों की जांच का दरवाजा खुल चुका है। विकेश नेगी की मांग है कि सरकार वहीं न रुके एससी,एसटी और ओबीसी के संदिग्ध प्रमाणपत्रों की अलमारी भी खोले क्योंकि अगर उन फाइलों से अपात्रता के मामले निकले तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि “प्रमाणपत्र किसने लिया?” सवाल यह भी होगा कि “प्रमाणपत्र किसने दिया, उसके बूते कौन नौकरी तक पहुंचा और जिसकी जगह वह पहुंचा उसका हक आखिर किसने लौटाया?”