उत्तराखंड में पत्रकारिता का नया गठजोड़
कलम की आड़ में हमराज का खेल
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में नई पत्रकारिता का दौर शुरू हो चुका है और कलम की आड़ में शातिर दिमाग रखने वाले दर्जनों पत्रकारों को इस बात का इल्म हो चुका है कि अब उन्हें राजनेताओं से दूरी रखकर कुछ चुनिंदा अफसरों का हमराज ही रहना है जिसके चलते वह उन्हें अपने विश्वास में लेकर उनके हर उस एजेंडे को पूरा करें जिसके चलते वह अपने चहेते अफसरों को यह विश्वास दिलाते आ रहे हैं कि उन्हें जहां से वसूली करनी है वह खुद जायेंगे और वसूली करके लायेंगे जिससे कि उन पर कोई नजर भी नहीं रखेगा। खास अफसरों ने अपने आंगन में कुछ चुनिंदा पत्रकारों को अपना हमराज बना रखा है और यह हमराज अपने साहब के लिए जगह-जगह जाकर वसूली कर रहे हैं और साहब भी उनसे खुश होकर उनकी उनकी झोली में लाखों रूपये डाल रहे हैं जिससे कि साहब और उनके खास पत्रकारों के बीच एक बेहतर ट्यूनिंग बन चुकी है कि अब दौलत कमाने का रास्ता एक नये सफर से तय होगा। उत्तराखण्ड के अन्दर जो नई पत्रकारिता का आगाज हुआ है वह यह बता रहा है कि अब अधिकांश कलमवीर बिकाऊ हो चुके हैं।
उत्तराखंड में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने वाली कलम को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता था, लेकिन अब कुछ चुनिंदा पत्रकारों और अफसरों के बीच कथित तौर पर बन रही असामान्य नजदीकियों को लेकर मीडिया और प्रशासनिक गलियारों में गंभीर सवाल उठने लगे हैं। चर्चा उन पत्रकारों की है, जिनकी पहचान खबरों से अधिक कुछ खास अफसरों के बेहद करीबी और ‘हमराज’ के रूप में होने लगी है। आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि यह रिश्ता केवल खबर और सूचना के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ स्थानों पर पत्रकारिता की आड़ में प्रभाव बनाने, लोगों पर दबाव डालने और कथित वसूली तक की शिकायतें सुनाई दे रही हैं। यदि इन आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो मामला केवल पत्रकारिता की गिरती साख का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था पर खड़ा होता है जिसमें एक तरफ अधिकारी सार्वजनिक पद पर बैठा है और दूसरी तरफ उसकी कार्यप्रणाली पर नजर रखने वाला पत्रकार ही यदि उसका सबसे भरोसेमंद ‘खास’ बन जाए, तो निष्पक्षता की उम्मीद आखिर किससे की जाए?
सवाल यह भी उठता है कि कुछ चुनिंदा पत्रकारों को ही अधिकारियों की कार्रवाई, बैठकों और महत्वपूर्ण सूचनाओं तक असाधारण पहुंच कैसे मिल जाती है? क्या यह महज बेहतर संपर्क और पेशेवर संबंध हैं, या इसके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था विकसित हो रही है जिसमें सूचना और नजदीकी दोनों का इस्तेमाल निजी हित साधने के लिए किया जा रहा है? अधिकारी और पत्रकार के बीच संवाद कोई असामान्य बात नहीं। प्रशासन की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए यह आवश्यक भी है। लेकिन यही संबंध जब पारदर्शिता की सीमा लांघकर ‘खास ट्यूनिंग’ में बदल जाए और उसके साथ आर्थिक हितों अथवा कथित वसूली के आरोप जुड़ने लगें, तो सवाल पूछना पत्रकारिता का ही दायित्व बन जाता है। पत्रकारिता का मूल चरित्र सत्ता से सवाल करना है, सत्ता का हिस्सा बन जाना नहीं। पत्रकार का काम किसी अधिकारी की छवि चमकाना, उसके विरोधियों को निशाने पर लेना या उसके निजी हितों के लिए प्रभाव का इस्तेमाल करना नहीं हो सकता।
अगर कहीं पत्रकार की कलम खबर लिखने से पहले यह देखने लगे कि ‘साहब’ नाराज तो नहीं होंगे, और अधिकारी भी चुनिंदा पत्रकारों को सूचना, पहुंच अथवा संरक्षण देकर अपने इर्द-गिर्द एक सुविधाजनक घेरा तैयार करने लगें, तो यह रिश्ता पत्रकारिता और प्रशासनकृदोनों की विश्वसनीयता के लिए खतरनाक संकेत है। सबसे गंभीर आरोप कथित वसूली को लेकर हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रेस अथवा किसी अधिकारी से नजदीकी का प्रभाव दिखाकर कारोबारियों, ठेकेदारों या अन्य लोगों से धन की मांग करता है, तो ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। केवल चर्चा के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन गंभीर शिकायतों को दबा देना भी समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि जहां भी ऐसे ठोस आरोप या शिकायतें सामने आती हैं, वहां तथ्यों और आर्थिक लेन-देन की निष्पक्ष जांच हो। आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी तय हो और निराधार हैं तो स्थिति भी साफ होनी चाहिए। किसी पत्रकार का किसी अधिकारी से परिचय या नजदीकी अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन यदि उसी नजदीकी का इस्तेमाल कथित वसूली, संरक्षण, दबाव या निजी आर्थिक लाभ के लिए होने के प्रमाण मिलते हैं, तो मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
पत्रकारिता की विश्वसनीयता किसी प्रेस कार्ड से नहीं, सवाल पूछने की स्वतंत्रता से बनती है। जिस दिन कलम व्यवस्था की निगरानी छोड़कर व्यवस्था के किसी हिस्से की ढाल बनने लगेगी, उसी दिन सबसे बड़ा नुकसान उस आम आदमी का होगा जिसकी आवाज बनने का दावा पत्रकारिता करती है। उत्तराखंड की पत्रकारिता के सामने इसलिए सवाल किसी एक पत्रकार या एक अधिकारी का नहीं है। सवाल उस कथित गठजोड़ का है, जिसकी चर्चा यदि सच है तो इसकी परतें खुलनी चाहिए। क्योंकि कलम अगर जनता की आवाज है तो उसे ‘साहब’ की हमराज नहीं, व्यवस्था की पहरेदार दिखाई देना चाहिए।