टिहरी प्राधिकरण में अफसरों की जंग!

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मानचित्र की एक फाइल ने खोल दिया मोर्चा
प्राइवेट फॅारेस्ट पर मानचित्र पास कराने का दबाव
अब पन्द्रह सितम्बर का सीसीटीवी खोलेगा राज
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर एक दशक से काफी अफसरों के बीच तलवारें खिंचती देखी गई हैं और उसी के चलते हमेशा यह सवालिया निशान लगते थे कि आखिरकार कुछ अफसर कैसे इतने बेलगाम हो जाते हैं कि वह अपने आपको सरकार से बडा समझकर वो खेल, खेलने में जुट जाते हैं जो सीधेतौर पर भ्रष्टाचार कहा जाता है। मुख्यमंत्री पांच साल से राज्य के अन्दर अफसरशाही पर लगाम लगाये हुये हैं लेकिन इन दिनों जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण टिहरी के उपाध्यक्ष व सहायक अभियंता के बीच एक शीत युद्ध होता हुआ नजर आ रहा है। सहायक अभियंता ने जहां प्रतिनियुक्ति पर आये एक सहायक अभियंता के काले चिट्ठे को बेनकाब किया है तो वहीं उन्होंने प्राधिकरण के उपाध्यक्ष पर भी वार किया है और इस वार का खत उन्होंने उपाध्यक्ष, सचिव आवास और आयुक्त गढ़वाल मण्डल को भी भेजा है। खत में कहा गया है कि उपाध्यक्ष द्वारा अमित गुप्ता नाम के एक व्यक्ति की मानचित्र पत्रावली को अवैध रूप से कराने के लिए उन पर दबाव बनाया गया जबकि उनके द्वारा यह बताया गया कि उच्च न्यायालय के सीविल अपील में पारित आदेश के अनुसार खसरा नम्बर 513 एक प्राइवेट फोरेस्ट है जिस पर वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं। खत में यह भी लिखा गया है कि मानचित्र स्वीकृत न करने पर उपाध्यक्ष उनसे नाराज हुये और उनका स्पष्टिकरण मांग लिया। सहायक अभियंता ने यह खुलासा भी किया है कि उरेडा में लगे सिक्योरिटी कैमरे की पन्द्रह सितम्बर की रिकार्डिंग से इन सब बातों को जांचा जा सकता है। अब सवाल यह है कि प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और सहायक अभियंता में जिस तरह से शीत युद्ध चल रहा है उस पर सरकार और शासन कब सच जानने के लिए एक बडी जांच बिठायेगी यह अभी भी एक पहेली बना हुआ है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत अफसरशाही को जवाबदेह बनाने की बात लगातार करते रहे हैं, लेकिन टिहरी जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण के भीतर सामने आया विवाद अब शासन के लिए जांच का विषय बनता दिखाई दे रहा है। यहां उपाध्यक्ष और सहायक अभियंता के बीच चल रहा कथित शीतयुद्ध अब एक ऐसे पत्र के रूप में सामने आया है, जिसमें मानचित्र स्वीकृति को लेकर दबाव बनाए जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सहायक अभियंता ने आरोप लगाया है कि अमित गुप्ता नाम के व्यक्ति की मानचित्र पत्रावली को स्वीकृत करने के लिए उन पर दबाव बनाया गया। अभियंता का कहना है कि संबंधित खसरा नंबर 513 ‘प्राइवेट फॉरेस्ट’ है और उच्च न्यायालय की सिविल अपील में पारित आदेश के चलते उस पर वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं। इसी आधार पर उन्होंने मानचित्र को स्वीकृति नहीं दी।
आरोप यहीं खत्म नहीं होते पत्र के मुताबिक मानचित्र स्वीकृत न होने पर उपाध्यक्ष नाराज हुए और सहायक अभियंता से स्पष्टीकरण मांग लिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि फाइल नियमों और न्यायालय के आदेश के कारण रोकी गई थी तो अभियंता से स्पष्टीकरण किस आधार पर मांगा गया? और यदि अभियंता के दावे गलत हैं तो शासन को भी स्थिति साफ करनी चाहिए। इस पूरे प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 15 सितंबर की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग हो सकती है। सहायक अभियंता ने दावा किया है कि उरेडा कार्यालय में लगे सिक्योरिटी कैमरों की उस दिन की रिकॉर्डिंग की जांच कराई जाए तो घटनाक्रम की वास्तविकता सामने आ सकती है। ऐसे में सबसे पहले उस फुटेज को सुरक्षित किया जाना जरूरी दिखाई देता है, ताकि किसी भी संभावित साक्ष्य को लेकर बाद में सवाल न उठें।
मामला अब प्राधिकरण की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। शिकायत सचिव आवास और आयुक्त गढ़वाल मंडल तक पहुंचने की बात कही गई है। इससे शासन के सामने भी सवाल खड़ा हो गया है कि क्या पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? अगर मानचित्र नियमानुसार था तो फाइल क्यों रुकी, और अगर खसरा नंबर 513 पर कानूनी अड़चन थी तो उसे पास कराने के कथित दबाव की जरूरत क्यों पड़ी? अब इस विवाद में आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर दस्तावेज बोलने चाहिए। मानचित्र की पूरी पत्रावली, खसरा नंबर 513 की कानूनी स्थिति, संबंधित न्यायालय आदेश, स्पष्टीकरण का पत्र और 15 सितंबर की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग इन सभी की निष्पक्ष जांच ही तय कर सकती है कि सच किस तरफ है। धामी सरकार के भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावे के बीच यह मामला शासन के सामने सीधा सवाल छोड़ रहा है क्या टिहरी प्राधिकरण के इस अफसरी घमासान की परतें खोली जाएंगी, या गंभीर आरोप फाइलों के बीच दबकर रह जाएंगे?

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