यमुना का सीना छलनी महकमों की आंखे बंद

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कालसी से कुल्हाल तक अवैध खनन पर उठते सवाल
पट्टे बंद फिर भी यमुना में अवैध खनन का खेल
देहरादून/विकासनगर। एक तरफ उत्तराखंड सरकार खनन से रिकॉर्ड राजस्व जुटाकर नया कीर्तिमान बनाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी तरफ पछवादून में यमुना और उससे सटे क्षेत्रों से कथित अवैध खनन की लगातार सामने आ रही शिकायतें इस उपलब्धि पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं। मीडिया द्वारा लगातार इन मामलों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा है, इसके बावजूद कालसी से कुल्हाल तक अलग-अलग क्षेत्रों से आरबीएम, रेत और अन्य उपखनिज की अवैध निकासी और परिवहन की शिकायतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में उत्तराखंड को खनन से 1217 करोड़ रुपये राजस्व प्राप्त होने की बात सामने आई है, जबकि लक्ष्य 950 करोड़ रुपये था। इससे पहले 2024-25 में 875 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले 1041 करोड़ रुपये राजस्व अर्जित किया गया था। यानी सरकारी खजाने में खनन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है लेकिन पछवादून में सवाल दूसरी तरफ से उठ रहा है। कालसी, डाकपत्थर, देवपुर, ढकरानी, कुल्हाल, कैंचीवाला और सिंघनीवाला समेत यमुना और नदी-नालों से सटे क्षेत्रों में कथित अवैध खनन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। आरोप हैं कि खनन पट्टे बंद होने के बावजूद कहीं रात के अंधेरे में तो कहीं दिन में मौका देखकर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से त्ठड, रेत और अन्य उपखनिज निकालकर अलग-अलग ठिकानों तक पहुंचाया जा रहा है।
यहीं सरकारी राजस्व का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि पट्टे बंद होने के दौरान खनिज चोरी-छिपे निकलता है और उसका वैध रवन्ना तथा रॉयल्टी नहीं कटती तो सरकार को प्रत्येक ऐसे वाहन के साथ राजस्व का नुकसान होता है। प्रतिदिन नुकसान वास्तव में कितने लाख रुपये का है, इसका सटीक आंकड़ा विभागीय जांच से ही सामने आएगा, लेकिन लगातार और बड़े पैमाने पर बिना रॉयल्टी खनिज निकलने की शिकायतें सही पाई गईं तो यह नुकसान गंभीर हो सकता है। प्रदेश में अवैध खनन और परिवहन रोकने के लिए 45 ई-चेक गेट, एएनपीआर कैमरे और आरएफआईडी जैसी तकनीक लगाने की बात कही गई है। लेकिन यमुना से सटे पछवादून के कई संवेदनशील रास्तों पर ई-गेट नहीं होने की स्थिति में सवाल है कि नदी से निकलने वाले प्रत्येक खनिज वाहन की निगरानी आखिर कैसे हो रही है?
अवैध खनन केवल खनन विभाग का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। जिला प्रशासन, खनन विभाग, राजस्व विभाग, पुलिस, परिवहन विभाग और वन क्षेत्र प्रभावित होने की स्थिति में वन विभाग सभी की अपने अधिकार क्षेत्र में भूमिका बनती है। नदी और वन क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील रास्तों पर यदि रात-दिन भारी खनिज वाहन निकलने की शिकायतें हैं तो संबंधित विभागों की संयुक्त जांच जरूरी है। विशेष रूप से वन विभाग की मैदानी मौजूदगी कहां है, यह सवाल भी उठता है यदि गतिविधियां आरक्षितध्वन क्षेत्र या वन मार्गों को प्रभावित कर रही हों। इसी तरह पुलिस और परिवहन विभाग वाहनों के दस्तावेज, ओवरलोडिंग और यातायात नियमों की जांच कर सकते हैं, जबकि खनन एवं राजस्व विभाग खनिज के स्रोत, रवन्ने और रॉयल्टी की वैधता की पड़ताल कर सकते हैं। अब कार्रवाई का पैमाना बदलने की जरूरत है। एक-दो ट्रैक्टर पकड़कर चालान करने से कथित अवैध कारोबार की जड़ तक पहुंचना मुश्किल है। आरबीएम नदी से कहां उठा, किस रास्ते निकला, किस वाहन में गया, रवन्ना था या नहीं, कहां उतरा, किस स्टॉक अथवा क्रशर ने लिया इस पूरी चेन का मिलान होना चाहिए।
मीडिया के द्वारा लगातार मुद्दा उठाए जाने के बाद भी यदि वही शिकायतें सामने आती रहें तो जिलाधिकारी स्तर से कालसी से कुल्हाल तक रात में संयुक्त औचक अभियान चलाने की जरूरत है। संवेदनशील निकासी मार्गों पर कैमरे अथवा ई-गेट लगाने की व्यवहार्यता देखी जाए और संदिग्ध स्टॉक तथा क्रशरों के रिकॉर्ड का मौके पर उपलब्ध भौतिक खनिज से मिलान कराया जाए। सरकार का 1217 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्वागत योग्य है, लेकिन असली चुनौती उस एक-एक रुपये को बचाने की भी है जो बिना रॉयल्टी खनिज निकलने पर सरकारी खजाने तक पहुंच ही नहीं पाता। सबसे बड़ा सवाल पट्टे बंद हैं तो यमुना का आरबीएम निकल कैसे रहा है, और निकल रहा है तो जिम्मेदार विभाग देख क्यों नहीं रहे?

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