सरकारी जमीनें लुटती रही

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घृतराष्ट्र बना रहा सिस्टम
बुलडोजर के साथ अफसरों पर कब कसेगा शिंकजा
पच्चीस साल के कब्जों का कौन देगा हिसाब?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में सरकारी जमीनों पर पच्चीस सालों में भूमाफिया कब्जा करते रहे और सरकारें और सिस्टम घृतराष्ट्र बनकर बैठे रहे। हैरानी वाली बात है कि जब भूमाफिया सरकारी जमीनों पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कब्जा कर सकते हैं तो आम आदमी की खाली पडी जमीनों पर कब्जा करने में उन्हें कौन रोक पाया है यह किसी से छिपा नहीं है। सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों को एक अर्से बाद सरकार अपने निशाने पर लेकर वहां बुलडोजर चलाती है लेकिन उन अफसरों पर कभी शिकंजा नहीं कसा गया जिनके कार्यकाल में सरकारी जमीनों पर आखिर कैसे कब्जे हुये थे। सरकार की अग्निपरीक्षा है कि क्या वह उन अफसरों पर भी कभी शिकंजा कसेगी जिनके शासनकाल में भूमाफियाओं ने सरकारी जमीनों पर कब्जे किये हैैं। हैरानी वाली बात है कि सिस्टम के अफसर सरकारी जमीनों पर होने वाले कब्जों पर पहले खामोशी साध कर रखते हैं और उसके बाद जब कुछ साल बाद वहां निर्माण हो जाता है तो उसके बाद शोर मचना शुरू हो जाता है कि सरकारी जमीनों पर कब्जे हो गये हैं ऐसे में उन अफसरों पर एक्शन होना चाहिए जो सरकारी जमीनों पर हुये कब्जों को बुलडोजर से तोड़ने के लिए तो आगे आ जाते हैं लेकिन अपने आप इन कब्जों पर दिखाई खामोशी में सरकारी एक्शन से बचने में हमेशा सफल होने का वह हुनर जानते हैं इसलिए उन पर एक्शन नहीं हो पाता।
उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पिछले करीब 25 वर्षों से सरकारी जमीनों पर भूमाफिया के कब्जे होते रहे और सिस्टम तमाशबीन बना रहा। कहीं फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया, कहीं सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ के आरोप लगे और कहीं बेशकीमती जमीनों पर कब्जे के बाद निर्माण तक खड़े कर दिए गए। सवाल सिर्फ कब्जा करने वालों का नहीं है, सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जिसने इतने लंबे समय तक इन गतिविधियों को पनपने दिया। हैरत की बात यह है कि जब भूमाफिया सरकारी जमीन तक पहुंच बनाकर उसे अपने कब्जे में ले सकते हैं, तो आम आदमी की खाली पड़ी निजी जमीन कितनी सुरक्षित है यह सवाल भी अपने आप खड़ा होता है। सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले सामने आने के बाद सरकारें कार्रवाई करती हैं, नोटिस जारी होते हैं और आखिरकार बुलडोजर भी चलता है। लेकिन असली सवाल वहीं का वहीं रह जाता है जिस दौर में ये कब्जे हुए, उस समय जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी क्या कर रहे थे?
सरकारी जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की संपत्ति होती है। उसके रिकॉर्ड की निगरानी, सीमांकन और सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की होती है। ऐसे में अगर वर्षों तक किसी सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा बना रहा, तो केवल कब्जेदार को दोषी ठहराकर पूरा मामला खत्म कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सरकार अगर वास्तव में भूमाफिया के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ना चाहती है तो कार्रवाई का दायरा कब्जा हटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कब्जा कैसे हुआ, रिकॉर्ड में क्या हुआ, किस स्तर पर लापरवाही हुई और किन अधिकारियों के कार्यकाल में यह सब संभव हुआ इन सवालों की भी जांच होनी चाहिए। आज सरकार के सामने सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा यही है कि क्या बुलडोजर सिर्फ कब्जे पर चलेगा या फिर उस सिस्टम की जवाबदेही भी तय होगी, जिसकी आंखों के सामने सरकारी जमीनें धीरे-धीरे भूमाफिया के कब्जे में जाती रहीं? कब्जा हटाना जरूरी है, लेकिन कब्जा होने देने वालों की जवाबदेही तय करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

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