‘विक्रम’ पुलिस के लिए था ‘बेताल’

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प्रशासन की नाक के नीचे गैंगस्टर बना स्टोन क्रेशर मालिक
किन राजनेता-अधिकारियों की बनी रही इस पर दया दृष्टि?
देहरादून। पौराणिक लोक कथाओं में एक कथा बड़ी ही रहस्यमय है और वह कथा है विक्रम और बेताल की। कथा के अनुसार विक्रम राजा था और बेताल एक मायावी था, जिसको पकड़ने का जिम्मा राजा के पास था। राजा जब भी बेताल को पकड़ने जाता तो, बेताल अपनी मायावी कहानियों का सहारा लेकर राजा के चंगुल से निकलकर बार-बार भाग जाता था। विक्रम और बेताल की इस कहानी आंशिक रूपांतरण उस समय सामने आया जब उत्तराखण्ड की राजधानी दून में एक विक्रम नाम के गैंगस्टर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जब विक्रम की कुंडली खंगाली गई तो महसूस हुआ यह विक्रम असल में उत्तराखण्ड पुलिस के लिए किसी बेताल से कम नहीं था। ऐसा कहना इसलिए भी सही है क्योकि वैसे तो विक्रम झारखंड का एक नामचीन गैंगस्टर था जिसकी भनक शायद उत्तराखण्ड पुलिस को कभी लग भी नहीं पाई। और तो और यह विक्रम उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर जनपद के एक इलाके के स्टोन क्रेशर का मालिक भी बन गया था। यह बात काफी हैरान करने वाली है कि इतने लंबे समय से एक बाहरी राज्य का कुख्यात अपराधी उत्तराखण्ड में आराम से रह रहा था और यहां के खुफिया विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी ही नहीं थी? सवाल तो यह भी उठ रहे है कि गैंगस्टर विक्रम सिंह जिस आसानी के साथ यहां रह रहा था और अपना स्टोन क्रेशर चला रहा था उसकी इस आसानी के पीछे आखिर किस राजनेता या अधिकारी का हाथ था? उत्तराखण्ड के किसी मूल निवासी को यदि अपना पासपोर्ट बनाना होता है तो वह इसी कोतूहल में जीता रहता है कि उसे इसके लिए कितनी जांचों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में यदि कोई बाहरी राज्य का कुख्यात गैंगस्टर यहां आकर अपनी ऐशगाह बड़ी आसानी से बना लेता है तो शक की सुईं घूमना तो लाजमी है?
उल्लेखनीय है कि झारखंड के जमशेदपुर के कुख्यात गैंगस्टर विक्रम की उत्तराखंड की राजधानी में हत्या हो जाती है। बताया जाता है कि तीन शूटर अलग-अलग तरीकों से हरिद्वार पहुंचे थे। वहां एक जुट हुए और राजधानी दून आकर शूटरों ने वारदात को अंजाम दिया। बताया यह भी गया है कि घटनास्थल से तो एक साथ हरिद्वार भागे और उसके बाद अलग होकर गायब हो गए। गैंगस्टर विक्रम शर्मा हत्यकांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है उसके कई दुश्मन मिल रहे हैं। हत्याकांड को अंजाम देने वाले शूटरों के भी झारखंड से उत्तराखंड तक कई मददगार मिले हैं। इस कारण हत्याकांड की गुत्थी और उलझती जा रही है। बताया जा रहा है कि झारखंड में विक्रम शर्मा जरायम की दुनिया का बड़ा नाम था। उस पर 50 से अधिक मामले दर्ज थे।
गैंगस्टर विक्रम सिंह के इतिहास को यदि खंगाला जाए तो साफ पता चलता है कि वह बड़ी ही चतुराई से अपने को साफ छवि का दर्शाने में जुटा हुआ था। उसके द्वारा किए जाने वालो सभी काम यहां के अफसरों और नेताओं ने किए जो एक साफ छवि वाले कारोबारी के हो जाते थे। बताया जा रहा है कि राजेताओं और अधिकारियों के बीच उसकी अच्छी जान पहचान के चलते ही वह स्टोन क्रेशर का मालिक बन गया था। बताया जा रहा है कि उसके पास एक लाइसेंसी हथियार भी हुआ करता था और यह लाइसेंस उसे एक अफसर की संस्तुति पर दिया गया था। ऊधमसिंह नगर में उसका आपराधिक इतिहास नहीं था तो अफसर ने भी अपने हस्ताक्षर कर फाइल को जिलाधिकारी के पास भेज दिया। इस प्रक्रिया में उसकी पृष्ठभूमि को नहीं देखा गया। जबकि लाइसेंस जारी होने के पांच साल पहले ही वह देहरादून से झारखंड पुलिस के हाथों गिरफ्तार किया गया था। यह बात मीडिया और सोशल मीडिया में आई थी कि वह कुख्यात अपराधी है।
विडंबना तो इसी बात की है कि जिस राज्य में एक आम नागरिक को पासपोर्ट से लेकर लाइसेंसी हथियार के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते हैं और अनेकों जांचों से गुजरना पड़ता है, उस उत्तराखण्ड में कैसे एक बाहरी राज्य का गैंगस्टर अपने रसूख को इतना बड़ा देता है कि उसको हथियार का लाइसेंस भी आसानी से मुहैया हो जाता है और यहां स्टोन क्रेशर जैसे बड़े धंधे का मालिक भी बन जाता है। सुगबुगाहट उठ रही है कि गैंगस्टर विक्रम की रसूख के पीछे किसी बड़े राजनेता और अधिकारी का हाथ है? तो क्या उत्तराखण्ड की डबल इंजन सरकार ऐसे राजनेता और अधिकारी को तालशने के लिए जांच बैठाने का कष्ट उठाएगी?

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