राज्य बनने से पहले लखनऊ का कुख्यात सूरज पाल भी मुठभेड़ में मारा गया था
क्लेमनटाउन के एक धार्मिक स्थल में भी रूका था आतंकी
सिर्फ कमजोरों तक ही क्यों रह जाती है सत्यापन अभियान की चाल
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने से पहले देहरादून के प्रेमनगर इलाके में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में पचास हजार का इनामी शांत रहा करता था और उसके बारे में कई सालों तक किसी को कुछ पता नहीं चला था लेकिन उसने जब सरकार के एक बडे राजनेता को मारने की धमकी दी तो उसके बाद लखनऊ से एसटीएफ की टीम ने प्रेमनगर में इस कुख्यात की घेराबंदी की थी तो प्रेमनगर थाने के ठीक सामने कुख्यात और एसटीएफ के बीच खुली मुठभेड हुई थी जिसमें कुख्यात मारा गया था और उसके मारे जाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने देहरादून के पुलिस कप्तान की पीठ थपथपाई थी। वहीं राजधानी के प्रेमनगर और क्लेमंटाउन के एक धार्मिक स्थल पर आतंकी ठहरे थे इनमें एक आतंकी प्रेेमनगर में पढाई कर रहा था तो दूसरा आतंकी एक धार्मिक स्थल पर बच्चों को शिक्षा दिया करता था लेकिन जब पंजाब की क्राईम ब्रांच टीम ने वहां छापा मारा था तो वह भाग खडा हुआ था। इतना ही नहीं राजधानी में कश्मीर के कुछ आतंकवादी भी खामोशी के साथ यहां पनाह लिये हुये थे तो हरिद्वार में भी चंद आतंकवादी एसओजी और दिल्ली की स्पेशल सेल टीम ने मार गिराये थे। अब झारखंड का कुख्यात बदमाश जो एक दशक से देहरादून में रह रहा था उसकी हत्या के बाद परतें खुल रही हैं कि वह किस तरह से दून को अपनी शरणस्थली बनाये हुये था।
उत्तर प्रदेश के जमाने से ही राजधानी और कुछ जिलों में कुख्यात बदमाशों द्वारा शरण लिये जाने की सच्चाई सामने आती रही थी और कुछ बदमाश भी मुठभेड़ में मारे गये थे। लखनऊ के कुख्यात पचास हजार का इनामी सूरज पाल प्रेमनगर इलाके में एक आम इंसान की तरह रहता था और किसी को यह कभी शक ही नहीं होता था कि वह लखनऊ का इतना बडा कुख्यात है कि उस दौर के मुख्यमंत्री भी उसे खोज निकालने के लिए ऑपरेशन चलवा रहे थे। प्रेमनगर में सूरज पाल लखनऊ की एसटीएफ और प्रेमनगर पुलिस की संयुक्त मुठभेड में मारा गया था और प्रेमनगर पुलिस के दरोगा और सिपाहियों को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी मिला था। राजधानी के अन्दर आतंकी भी अपनी पहचान छुपाकर रहने में सफल होते रहे और जब देश के अन्दर किसी राज्य में बडी वारदात होती थी तो उसके बाद वहां की क्राईम ब्रांच और एसटीएफ इन आतंकियों और अर्न्डरवर्ल्ड के बदमाशों को अपने साथ दबोचकर ले गये थे। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मुम्बई, बिहार के काफी कुख्यात बदमाश भी उत्तराखण्ड के कुछ जिलों में अपनी शरण लेते रहे और उन्होंने कभी भी उत्तराखण्ड के किसी भी जनपद में कोई अपराध नहीं किया था।
अब कल जिस तरह से झारखंड के कुख्यात गैंगेस्टर विक्रम शर्मा को भाडे के दो हत्यारों ने सिल्वर सिटी में जिम की सीढियों पर ही गोलियों से भूनकर मौत की नींद सुलाया उससे सवाल खडे हो गये कि आखिरकार यह गैंगेस्टर कैसे गुमनाम तरीके से राजधानी में अपनी पहचान छुपाकर रह रहा था? सवाल खडे हो रहे हैं कि झारखंड में पचास से ज्यादा सनसनीखेज अपराध करने वाले कुख्यात गैंगेस्टर विक्रम शर्मा पर आज तक पुलिस के हाथ क्यों नहीं पहुंच पाये जो आये दिन घर-घर सत्यापन करने का दम भरा करती है? कुख्यात गैंगेस्टर के पास पिस्टल होना कई सवालों को जन्म दे गया कि आखिरकार उसने यह पिस्टल कहां से और कैसे बनवाया था जबकी उस पर पचास से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे? अभी यह भी एक पहेली है कि राजधानी में आखिर वो कौन पॉवरफुल लोग हैं जिन्होंने इस कुख्यात को अपनी शरण दे रखी थी और उसी के चलते उसने उधमसिंहनगर में स्टोन क्रेशर तक लगा रखा था? कुल मिलाकर कहा जाये तो सत्यापन का भोपू शायद कमजोरों पर ही चलता है क्योंकि अगर ऐसा न होता तो पुलिस के सत्यापन अभियान में गैंगेस्टर विक्रम शर्मा कब का पुलिस की निगाह में आ गया होता।
