देवी उपासनाः ‘कुर्सी बचालो’ स्वाः

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तंत्र-मंत्र से नहीं तो, अराधना से होगा कल्याण?
अंधविश्वास के तालाब में गोते लगा रहे राजनेता
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। राजनीति में चाहे कोई कितनी भी सादगी दिखा ले लेकिन वह उस लक्ष्य सिर्फ एक होता है, कुर्सी। कुर्सी भी कोई ऐसी वैसी नहीं बल्कि सबसे उच्च स्तर वाली। किसी को यह इस कुर्सी को हासिल करने में कई साल बीत जाते हैं, तो किसी को यह कुदरत की मेहरबानी से झटके में हासिल हो जाती है। कई तो ऐसे राजनेता भी हैं जो जीवन भर इस कुर्सी की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं और कई साम दाम दंड भेद करने के बाद भी इसे या तो हसिल नहीं कल पाते हैं या फिर हसिल करने के बाद राजनीतिक षड़यंत्रों के चलते इससे हाथ धो बैठते हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति में ऐसे उदाहरणों का एक इतिहास रहा है जो कुर्सी की इस कहानी को बयां करते हैं।
वैसे तो उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव होने में अभी लगभग एक वर्ष समय बचा हैं लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं उफान पर हैं कि उससे पहले ही उत्तराखण्ड की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ सकता है और इस भूचाल के चलते कई दिग्गज राजनेताओं की कुर्सी डगमगा सकती है। इस राजनीतिक भूचाल के अंदेशों से ही कुछ दिग्गज राजनेता अभी से सकते में आए हुए नजर आ रहे हैं। यहीं कारण है कि अब अपनी कुर्सी बचाने के लिए इन राजनेताओं का अपनी कार्यक्षमता पर कम और अंधविश्वास पर ज्यादा भरोसा नजर आ रहा है। कुर्सी बचाने के चक्कर में कुछ राजनेता तंत्र मंत्र का सहारा ले रहे हैं तो कुछ जादू टोने का। हालांकि सब जानते हैं कि इससे इन राजनेताओं को कुछ हासिल नहीं होने वाला है फिर यह अंधविश्वास ही अब इन राजनेताओं का एक मात्र सहारा बना हुआ है। वहीं इसी क्रम में कुछ दिग्गज राजनेता तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए तंत्र मंत्र को छोड़ सीधे देवी की आराधना का ही सहारा ले रहे हैं।
एक वक्त था जब किसी के घर में कोई बच्चा बीमार पड़ जाता था और चिकित्सक के काफी इलाज करने के बाद भी उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नजर नहीं आता था तो घर के बुजुर्ग कहते थे कि देवी-देवताओं की उपासना करने से बच्चे की तबीयत ठीक हो जाएगी। माना जाता है कि बच्चों के लिए की गई उपासना के बाद वह जल्द ही स्वस्थ भी हो जाते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः इन्हीं बातों को आधार मानकर आजकल कुछ राजनेता यह समझ बैठे हैं कि शायद उपासना से ही उनकी कुर्सी भी बच जाएगी। उत्तराखण्ड की वादियों में आजकल इसी बात का शोर है कि ज्यादा तो नहीं मगर एक राजनेता ऐसा है, जिसे अपनी कुर्सी हाथ से फिसल जाने का डर बहुत सता रहा है और अपने इस डर को खत्म करने के लिए ही उसने उपासना का सहारा ले लिया है। माना जा रहा है कि यह राजनेता अपनी देवी उपासना के दौरान मंत्रों का भी जाप कर रहा है और इन मंत्रों का अर्थ यहीं निकलकर सामने आ रहा है कि ‘हे देवी, मेरी कुर्सी बचालो स्वाः ….’
आधुनिकता के इस दौर में कोई इतना अंधविश्वासी कैसे हो सकता है? किसी की कुर्सी जाएगी यह नहीं जाएगी, यह उसके द्वारा किए गए कार्यों पर निर्भर करता है। यदि अपने कार्यकाल में अच्छे और जनकल्याण से जुड़े कार्य जिस किसी भी राजनेता ने किए होंगे तो उसकी कुर्सी को आंच नहीं आ सकती। हां, लेकिन यदि उस राजनेता ने अपने कार्यकाल में सिर्फ और सिर्फ अपना ही स्वार्थ सिद्ध किया होगा तो उसकी कुर्सी तो जानी तय ही है फिर चाहे वह चुनाव से पहले जाए या फिर चुनाव के बाद जनता द्वारा नकार दिए जाने के बाद जाए। यह सब तो राजनेता की कार्यशैली पर ही निर्भर करता है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि इन सभी तथ्यों से उत्तराखण्ड के अधिकांश दिग्गज राजनेता वाकिफ हैं, बावजूद इसके वह अंधविश्वास का सहारा ले रहें, यह बात किसी के भी गले से नीचे नहीं उतर रही। फिर इन राजनेताओं ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानों एक दौड़ लगी हुई है यह सबित करने कौन सबसे बड़ा अंधविश्वासी है? पहले तो यहीं खबरें आती थी कि कुर्सी बचाने के लिए राजनेता तंत्र-मंत्र और जादू टोने का सहारा लेते हुए कहीं हवन कराते थे या कथित काली शक्तियों की पूजा करते थे और कभी-कभी समय का चक्र भी उनका साथ देता था और उनकी कुर्सी बच जाती थी। जिसके बाद से कुर्सी बचाने के लिए तंत्र-मंत्र के यह स्वांग चलन में आ गया था। हालांकि मौजूदा समय में स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आया है और अब राजनेता तंत्र-मंत्र से संतुष्ट होते हुए नजर नहीं आ रहे हैं और अब उन्होंने अपने कल्याण के लिए देवी-देवताओं की आराधना करना शुरू कर दिया है। कुर्सी का मोह ही ऐसा है कि अब कई राजनेताओं को अंधविश्वास के इस तालाब में गोते लगाने के लिए उतरना ही पड़ रहा है लेकिन हकीकत यह भी है कि जिसने जैसा बोया होगा वह वैसा ही काटेगा क्योंकि ‘‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय…’’

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