चार साल से भ्रष्टाचारियों पर नकेल फिर भी नहीं खत्म हो रहा भ्रष्टाचार
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही राज्य के अन्दर भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों की गिरफ्तारी के आंकडे यह बताने के लिए काफी हैं कि किस तरह से आम जनमानस को भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरों का शिकार होना पडता है? मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों की नाक मे नकेल डालने के लिए एक बडा ऑपरेशन चला रखा है जिसके तहत भ्रष्टाचारी और रिश्वतखोर सलाखों के पीछे भी पहुंच रहे हैं लेकिन उनमें सरकार का डर आखिर क्यों नजर नहीं आता जिसके चलते वह आम जनमानस से रिश्वतखोरी करने के लिए बेखौफ होकर आगे बढ जाते हैं। सबसे अहम बात यह है कि वही रिश्वतखोर विजिलेंस की पकड मे आता है जिसके खिलाफ पीडित व्यक्ति शिकायत करने के लिए विजिलेंस की चौखट पर पहुंचता है। हरदा ने भी यहां तक आरोप लगाया कि राज्य के अधिकांश महकमों में भ्रष्टाचार का बोलबाला है जिससे समझा जा सकता है कि राज्य के अन्दर भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के मन में सरकार और सिस्टम का कोई डर नहीं है और वह मौका पाते ही भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी करने के लिए आगे बढ निकलता है। यही कारण है कि राज्य की जनता ऐसे रिश्वतखोर और भ्रष्टाचारियों से आजादी पाने के लिए एक बार फिर लोकायुक्त बनाने की मांग पर आगे आते जा रहे हैं।
उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही अगर भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों को पकडने जाने की कुंडली खंगाली जाये तो उससे साफ दिखाई दे जायेगा कि राज्य को किस तरह से ऐसे हैवानों ने अपने शिकंजे में ले रखा है। उत्तराखण्ड कब भ्रष्टाचारी और रिश्वतखोरों से आजाद हो पायेगा यह राज्य की जनता एक दशक से सपना देखती आ रही है। भाजपा शासन में ही आम जनमानस ने उम्मीद पाली थी कि भ्रष्टाचारियों, घोटालेबाजों और रिश्वतखोरों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए लोकायुक्त का गठन राज्य के अन्दर होना चाहिए क्योंकि छोटे रिश्वतखोर जिनके खिलाफ पीडित व्यक्ति विजिलेंस के पास शिकायत लेकर आता है उसे तो दबोच लिया जाता है लेकिन भ्रष्टाचार करने वाले बडे-बडे मगरमच्छ इसलिए भी हमेशा आजाद नजर आते हैं क्योंकि उन्हें सीधे पकडने का अधिकार विजिलेंस के पास नहीं है। सवाल खडे हो रहे हैं कि अगर सरकार भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के चेहरे आम जनमानस के आगे बेनकाब करने का संकल्प लिये हुये हैं तो फिर वह राज्य के अन्दर लोकायुक्त का गठन करने से क्यों डरी रहती है? उत्तराखण्ड के अन्दर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरों के नेटवर्क को नेस्तनाबूत करने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बडा ऑपरेशन चला रखा है जिसके चलते राज्य के अन्दर भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों पर शिकंजा तो कसा जा रहा है लेकिन उसके बावजूद भी उनके मन में सरकार और सिस्टम का कोई भय नजर नहीं आ रहा? कुछ सरकारी महकमों के छोटे अधिकारी और कर्मचारी मौका मिलते ही रिश्वत लेने से बाज नहीं आ रहे जिससे यह सवाल तेजी के साथ फिर पनपने शुरू हो गये हैं कि आखिर कुछ सरकारी महकमों में तैनात छोटे अधिकारी व कर्मचारियों के मन में जेल की सलाखों के पीछे जाने का डर क्यों नहीं दिख रहा है? चंद दिन पूर्व विजिलेंस की टीम ने कोटद्वार में लीडिंग फायरमैन रणवीर सिंह, फायर स्टेशन कोटद्वार को विजिलेंस की टीम ने बीस हजार रूपये की रिश्वत लेते हुए फायर स्टेशन के पास रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई कि रणवीर सिंह ने शिकायतकर्ता से उनके मालिनी वैली कॉलेज ऑफ एजुकेशन कोटद्वार की बिल्डिंग की फायर एनओसी रिनुअल करने के नाम पर रिश्वत मांगी थी और उसके बाद वह विजिलेंस के शिकंजे मे आ गया था।
सवाल यह है कि जब राज्य के अन्दर सरकार और सिस्टम की सख्ती के बावजूद भी भ्रष्टाचारी और रिश्वतखोर आम जनमानस को अपना शिकार बनाने से बाज नहीं आ रहे हैं तो फिर राज्य के अन्दर सरकार को सशक्त लोकायुक्त का गठन करने के लिए आगे आना चाहिए जैसी राज्य के अन्दर अब मांग उठ रही है।
