रिकार्डिंग करने की खूब कला जानते हैं कई कलमवीर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में काफी कलमवीर तो कुछ अफसरों और नेताओं के स्टिंग करने में अपनी कला दिखा चुके हैं और उनकी इस कला से उत्तराखण्ड की सियासत में काफी भूचाल भी मचा था लेकिन हैरानी वाली बात है कि राज्य के अन्दर कुछ नेताओं ने भी अपने आपको आवाम के बीच हीरो बनने के लिए फोन पर अपने विपक्षी को घेरने के लिए उसकी बातों को बातचीत के दौरान रिकार्ड करने का खेल खेलकर सियासत में हलचल मचाते रहे हैं? आज के इस दौर में दर्जनों राजनेताओं और अफसरों ने फोन पर नॉर्मल कॉल करने और सुनने की परम्परा को त्याग दिया है और वह किसी से भी बात करने के लिए सिर्फ व्हटसप कॉल करने मे ही विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का हमेशा शक रहता है कि बातचीत के दौरान काफी लोग आवाज टेप करने और उसके बाद उसका दुरूपयोग के खिलाडी बन चुके हैं इसलिए अब उन्होंने व्हटसप कॉल को ही सुनने और करने का अपना लक्ष्य बना लिया है।
उत्तराखण्ड का जन्म होने के बाद से ही कई बार राजनेताओं व चंद अफसरों के स्टिग को लेकर खूब बवाल मचता रहा है और यह बहस भी चलती रही है कि आखिरकार कब तक स्टिंगबाज सियासत के लिए किसी को भी अपना शिकार बनाते रहेंगे। उत्तराखण्ड के अन्दर स्टिंगबाजी का खेल वर्षों से देखने को मिलता आ रहा है और यही कारण है कि राजनेता से लेकर अफसर तक स्टिंगबाजों से घबराने लगे हैं और उन्होंने तो अपने दफ्तर के बाहर यहां तक अकित करा रखा है कि कोई भी व्यक्ति या मीडियाकर्मी मोबाइल फोन व इंलौक्ट्रॉनिक डिवाइज लेकर दफ्तर में प्रवेश न करे।
उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और मदन बिष्ट का स्टिंग किसी से छिपा नहीं है और उसकी गूंज एक बार फिर राज्य के अन्दर उस समय गूंजनी शुरू हो गई जब सीबीआई ने स्टिंग करने वाले और स्टिंग में शामिल लोगों को वाइस सैम्पल के लिए नोटिस भेजा है। अभी यह मामला राज्य के गलियारों में उफान पर था कि अचानक उत्तराखण्ड के पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत और कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल की निजी बातचीत भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी जिसको लेकर सोशल मीडिया पर यह बहस भी चलने लगी है कि क्या अब राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि किसी की बातचीत को भी रिकार्ड कर उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाये। हरक सिंह रावत और प्रेमचंद अग्रवाल की बातचीत का वीडियो वायरल होने से एक बार फिर यही बहस शुरू हो गई थी कि किसी को भी अपनी बातों में उलझाकर उससे बातें कबूलवाना ही स्टिंग है। स्टिंगबाज सियासत आखिरकार उत्तराखण्ड के अन्दर कब खत्म होगी यह तो भविष्य के गर्त में कैद है लेकिन जिस तरह से आज काफी नेता और अफसर सिर्फ व्हटसप पर ही किसी से बात करने के लिए आगे आते हैं और नॉर्मल कॉल करने का अब शायद डर के चलते प्रचलन भी खत्म होता जा रहा है? सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिर आपसी बातचीत को रिकार्ड करके उसे वायरल कराने का जो हथकंडा उत्तराखण्ड में समय-समय पर मिलता है उससे अब अधिकांश लोग बातचीत करते हुए अपने शब्दों को तोलमोल कर इसलिए बोलते हैं कि कहीं उनके फोन को रिकार्ड न कर लिया जाये? इस रिकार्डिंग के पीछे आखिर उनकी क्या मंशा रहती है यह तो एक बडा सवाल है लेकिन स्टिंगबाजी की यह सियासत उत्तराखण्ड के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा रही? स्टिंगबाज भले ही व्हसप कॉल करे लेकिन वह दूसरे फोन से उस बात को रिकार्ड कर लेते हैं जिसकी भनक दूसरे व्यक्ति को नहीं होती जो अपने मन की कोई भी बात बेखौफ होकर बोलता रहता है। आज उत्तराखण्ड के अन्दर काफी नेता और अफसर किसी से भी नॉर्मल कॉल पर बात करने से डरे रहते हैं और बातचीत का जरिया अब सिर्फ व्हटसप कॉल रह गया है क्योंकि उत्तराखण्ड के अन्दर जहां काफी मीडियाकर्मी स्टिंगबाजी के खिलाडी बने हुये हैं तो वहीं कुछ राजनेता भी स्टिंगबाजी में महारथ हासिल किये हुये हैं इसलिए उत्तराखण्ड में यही बहस आज भी चलती आ रही है कि स्टिंगबाज सियासत का अंत कब होगा? हैरानी वाली बात तो यह है कि काफी अफसरों ने अपने दफ्तर के बाहर ही बोर्ड पर लिखवा रखा है कि कोई भी अफसर से मिलने के दौरान मोबाइल फोन व इलैक्ट्रानिक सामान दफ्तर के अन्दर नहीं ले जा सकता।
