अंकिता हत्याकांडः न्याय होगा या फिर सियासत, सियासत और सियासत!

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अपने-अपने तर्कों सही बताने में जुटी भाजपा-कांग्रेस
दोषियों को मिली सजा, तो कौन वीआईपी है बाहर?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड की वादियों आजकल काफी राजनैतिक तनाव है, लगता जल्द ही आने वाले चुनाव हैं….। अकसर देखने को मिलता रहा है कि जिस किसी राज्य में चुनाव आने वाले होते हैं, उस राज्य में कोई न कोई एक ऐसा मुद्दा बोतल के जिन्न की तरह बाहर आ ही जाता है जो चुनावी राज्य की पूरी राजनीति को हिलाकर रख देता है। अगले वर्ष की शुरूआत में उत्तराखण्ड में भी चुनाव होने हैं और इसके मद्देनजर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उत्तराखण्ड सरकार को अभी से घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस को मुद्दा भी ऐसा मिला है जिसको वह संभवतः संजीवनी समझ रही है और इस मुद्दे के सहारे वह हर मोर्चे मे सरकार से आगे दिखने की हर संभव कोशिश कर रही है। यह मुद्दा उत्तराखण्ड का बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड, जिसको लेकर कांग्रेस, सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में जुटी हुई है। कांग्रेस का कहना है कि अंकिता के परिजनों को न्याय दिलाने की लड़ाई में पीछे नहीं हटने वाली और इस बात के प्रमाण के लिए वहा इस मुद्दे को उत्तराखण्ड की सड़कों से लेकर देश की राजधानी दिल्ली में भी उठा रही है। वहीं उत्तराखण्ड सरकार का यह कहना है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में कांग्रेस न्याय के साथ नहीं खड़ी है बल्कि वह न्याय की दिशा में रोड़े अटकानें का काम कर रही है। यह बात तो साफ नजर आ रही है कि इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं? यह भी माना जा सकता है कि इस मुद्दे को लेकर भाजपा भले ही इतनी आक्रमक नजर न आ रही हो लेकिन कांग्रेस जो पिछले लंबे समय से उत्तराखण्ड में अपनी काफी हद तक खो चुकी राजनीतिक जमीन को वापस से हासिल करने के लिए इस मुद्दे का सहारा ले रही है? रह रहकर सवाल यहीं उठ रहा है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में पूर्ण रूप से न्याय मिल भी पाएगा या फिर होगी सियासत, सियासत और सियासत?
उल्लेखनीय है कि सितंबर 2022 में उत्तराखंड के पौड़ी जिले के वनंतरा रिजॉर्ट की 19 वर्षीय रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी की बेरहमी से की गई हत्या का मामला सामने आया था। बताया गया था कि रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके सहयोगियों ने कथित तौर पर किसी वीआईपी को ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने से मना करने पर अंकिता की हत्या कर दी गई थी। मामले की जांच हुई तो रिजार्ट से गायब हुई अंकिता शव चिला नहर में मिला। जांच में दोषी पाए गए रिजार्ट के मालिक पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को मई 2025 में कोटद्वार की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुना दी। मामला अभी भी शांत नहीं हुआ था और हत्याकांड में शामिल कथित वीआईपी का नाम उजागर न होने पर अंकिता के परिजनों और जनता में आक्रोश के बाद, जनवरी 2026 में उत्तराखंड सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। इस मामले ने सियासी रंग तब लिया जब बीजेपी से निष्कासित पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी और अभिनेत्री उर्मिला सनावर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया, जिसके बाद उत्तराखंड का अंकिता भंडारी हत्याकांड दोबारा चर्चा में आ गया है। वीडियो में उर्मिला सनावर ने हत्याकांड से जुड़े एक कथित ‘वीआईपी’ का नाम सामने लाने की बात कही है। उन्होंने इस संबंध में बीजेपी के एक पूर्व विधायक के साथ हुई बातचीत का ऑडियो भी जारी किया था, इस ऑडियो की सत्यता पर्दा उठना अभी बाकी है क्योंकि न्यायालय ने उस जांच के लिए भेज रखा है।
कितनी हैरान करने वाली बात है कि उत्तराखण्ड की एक बेटी जिसकी रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या हो जाती है, उसके परिजन पूर्ण रूप से न्याय दिलाने की मांग करते हैं तो इसमें राजनीतिक दलों को अपना निजी स्वार्थ दिखने लग जाता है। अंकिता भंडारी हत्याकांड में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले दलों और चेहरों में सत्ता से लंबे समय तक दूर रहने की कुंठा भी साफ देखने को मिल रही है। कांग्रेस जो एक वक्त पर उत्तराखण्ड का सबसे मजबूत राजनीतिक दल माना जाता था और उसका जनाधार भी भाजपा से कहीं अधिक था, वह पिछले लंबे समय से हाशिए पर चल रहा था लेकिन पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस के अंदर एक अलग ही स्फूर्ति देखने को मिल रही है और इस स्फूर्ति का प्रमुख कारण है अंकिता भंडारी हत्याकांड का मुद्दा जिसको लेकर कांग्रेस राज्य की सड़कों से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे को गर्मजोशी के साथ उठा रही है और इसे एक देशव्यापी मुददा बनाने में जुटी हुई है। उत्तराखण्ड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गादियाल ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता का आयोजन करके उत्तराखण्ड सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने पीड़ित परिवार की बजाय एक तीसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर सीबीआई जांच कराने की बात की, जिससे संदेह पैदा होता है कि जांच को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। तर्क-वितर्कों की इस जंग में भाजपा भी पीछे नहीं हटने वाली थी और उसने भी कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करके यह कह दिया किया इस प्रकरण में न्याय दिलाने में कांग्रेस ही रोड़े अका रही है। इस राजनीतिक खींचतान के बीच एक सवाल तो अब भी खड़ा का खड़ा ही है कि यदि न्यायालय ने सभी तीन दोषियों को सजा सुना दी है तो वह कथित वीआईपी कौन है जो बाहर है। बहरहाल, इस पूरे प्रकरण पर पूर्ण न्याय कब मिलेगा यह तो कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि अगले वर्ष होने वाले चुनाव तक यह मुद्दा मुख्य सियासी बिंदु जरूर बना रहेगा।

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