बगावत कुचल दो ‘सरकार’

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आईपीएस ने किसके इशारे पर थामा बगावत का झंडा?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जबसे जन्म हुआ है तबसे कुछ सरकारों के मुखियाओं ने अपने आंगन में राज्य के बडे प्रशासनिक और पुलिस अफसरों को इतनी छूट दी थी कि वह राज्य में चाहे जो भी कर दें उन्हें कोई कुछ कहने वाला नहीं होगा। कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों के मुंह लगे चंद अफसरों ने तो भ्रष्टचार और हिटलरशाही का तांडव राज्य के अन्दर किया था उसकी गूंज हमेशा दिल्ली तक गूंजी थी और ऐसे अफसरों को इसका बडा खामियाजा भी अपने आका के चले जाने के बाद भुगतना पड़ा था। एक पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कुछ बडे अफसरों और एक-दो पुलिस अफसरों ने मिलकर सिंडिकेट बनाया हुआ था और वह जिस सफर पर चले थे वो सफर भ्रष्टाचार की डगर से होकर ही निकला था। उत्तराखण्ड की कमान युवा मुख्यमंत्री के हाथो मे है और उन्होंने राज्य की अफसरशाही को चार साल से दो टूक संदेश दे रखा है कि जो अफसर अच्छा काम करेगा उसे सरकार प्रोत्साहित करेगी और जो अफसर हिटलरशाही अंदाज में काम करने का भ्रम पालेगा तो उसे सरकार किसी भी कीमत पर सहन नहीं करेगी। मुख्यमंत्री की दबंग कार्यशैली से अफसरशाही को यह इल्म है कि वह अब पूर्व सरकारों में जिस अंदाज के साथ काम करते थे वो धामी राज में नहीं कर पायेंगे। अचानक एक आईपीएस ने सरकार के मुखिया के खिलाफ बडे शातिराना अंदाज में चौसर बिछाई और वह बगावत की राह पर आगे बढ़ा जिससे सवाल खडे हो गये कि आखिरकार किसके इशारे पर आईपीएस ने बगावत का झंडा उठाने का दुसाहस किया था? राज्य के गलियारों में बहस चल उठी है कि आईपीएस की बगावत कुचल दो सरकार नहीं तो यह एक घातक रूप ले सकती है?
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी ने जबसे सरकार की कमान संभाली है तो उन्होंने राज्य में एक ही संदेश दिया हुआ है कि सरकार पारदर्शिता और स्वच्छता के साथ आगे बढेगी और अगर किसी भी अफसर ने भ्रष्टाचार या घोटाला करने का रास्ता चुना तो उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल में लाई जायेगी। मुख्यमंत्री ने अपने शासनकाल में भ्रष्टाचार और घोटाले करने वालों के खिलाफ कडा रूख अपना रखा है और जिस दबंगता के साथ उन्होंने भ्रष्टाचारियों को आईना दिखाने का दौर शुरू किया उससे उन अफसरों में हमेशा एक बडी खलबली मची हुई है जो सिस्टम में अपने आपको खुद सरकार समझने का भ्रम पालते रहे हैं? उत्तराखण्ड के अन्दर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हमेशा तबादलों में पारदर्शिता का आईना आवाम के सामने रखा और कभी भी यह शोर नहीं मचा कि तबादलों में कोई भेदभाव किया गया था। अचानक एक आईपीएस ने सरकार के मुखिया के खिलाफ पर्दे के पीछे रहकर बगावत का झंडा बुलंद करने का भ्रम पाल लिया और वह मुखिया को आखिर किसके इशारे पर चुनौती देने के लिए आगे बढ़ रहा था यह उत्तराखण्ड के अन्दर एक बडी बहस का विषय भी बना हुआ है? चर्चा तो यहां तक है कि इस आईपीएस के साथ चंद बडे अफसर भी हैं और इनकी कैमेस्ट्री एक पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में भी खुलकर देखने को मिली थी? सवाल यह है कि एक ओर तो मुख्यमंत्री को अस्थिर करने के लिए बार-बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने का समय-समय पर भोपू बजाया जाता है तो वहीं कुछ समय पूर्व अचानक मुख्यमंत्री के खिलाफ सीधी बगावत करने के लिए एक आईपीएस को आखिर ऐसी ऊर्जा कहां से मिल गई कि वह बगावत का झंडा उठाकर सरकार के मुखिया को ही अपनी वर्दी का अहंकार दिखाने के लिए आगे बढ़ चला था? उत्तराखण्ड के अन्दर यह बहस भी चल उठी है कि सरकार उस आईपीएस की बगावत को जरूर कुचल दो जिसने उन्हें साजिश के तहत ललकारने का दुसाहस किया है।
उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही देखने में आया है कि कुछ अफसरों को जब उनकी पसंद की पोस्टिंग नहीं मिलती तो वह सरकार के मुखिया के खिलाफ पर्दे के पीछे रहकर साजिशों का खेल खेलने में अपने कदम आगे बढा देते हैं? चंद पूर्व मुख्यमंत्रियों ने जब स्वच्छ सरकार चलाने का मनसूबा पालकर अपनी पसंद के अफसरों को राज्य में तैनात किया था तो भ्रष्ट और अहंकारी कुछ अफसरों ने सरकार के मुखिया के खिलाफ ही ऐसी साजिश रच दी थी कि उनका राजपाठ ही उनसे छीन गया था और यह बात भी शीशे की तरह साफ हो गई थी कि राज्य के कुछ अफसर राजनीति में इतनी बढी दखल रखते हैं कि वह सरकार तक को अपनी ताकत का अहसास कराने से बाज नहीं आते?

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