गिरफ्तारी के बाद फोटोशूट पर बैन

0
129

देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड पुलिस जोकि फर्जी इन्काउन्टर, राजीनिक द्वेष के चलते राजद्रोह के झूठे मुकदमे दर्ज करने और सम्पत्ति विवादों में लिप्त होने के चलते कई बार उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय से फटकार खा चुकी है के उस मनमाने रवैये पर रोक लगेगी जिसके तहत पुलिस किसी को भी अरेस्ट करके सीधे मीडिया के सामने उसका फोटोशूट कराकर आवाम के सामने उसका तमाशा बनाने के लिए आगे आते रहे हैं। यह सबकुछ इसलिए संभव हो पाया है राजधानी के वरिष्ठ अधिवक्ता ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत की थी कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को अरेस्ट कर उसके रिमांड से पूर्व उसके निजी विवरण और चेहरे को सार्वजनिक करके उसे आम जनमानस के सामने दागदार करती आ रही है इसलिए पुलिस किसी को भी अरेस्ट करके उसका निजी विवरण और चेहरे को सार्वजनिक न करे क्योंकि जब अरेस्ट होने वाला व्यक्ति न्यायालय से बरी होता है तो फिर उसके ऊपर लगा दाग कोई पुलिस अफसर नहीं धो सकता जो उसके अरेस्ट होने के बाद उसका मीडिया के सामने फोटोशूट कराने के लिए आगे आ जाता है। मानवा अधिकार आयोग ने शासन और डीजीपी को आदेश दिये हैं कि वह राज्य के सभी थाने व चौकियों को उचित निर्देश जारी किये जायें कि वह अरेस्ट के बाद किसी भी व्यक्ति का फोटोशूट और उसका निजी विवरण जारी न करे।
उत्तराखण्ड मानव अधिकार आयोग द्वारा दस जून को पारित अपने निर्णय के द्वारा पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड एंव पुलिस अधीक्षक देहरादून को रिमाण्ड से पूर्व अभियुक्त के निजी विवरण और चेहरे ना सार्वजनिक करने के सम्बन्ध में शासन एंव पुलिस मुख्यालय स्तर पर राज्य के सभी थाने व चौकियों को उचित निर्देश जारी किये जाने के निर्देश जारी किये गये है। उक्त आदेश वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश सेठी व अन्य द्वारा सचिव गृह व पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड के विरूद्ध योजित एक शिकायत के अग्रसित किये गये है जिसमें शिकायतकर्ता द्वारा स्थानीय पुलिस द्वारा अभियुक्तों को पुलिस रिमाण्ड से पूर्व ही बिना किसी प्रक्रिया या जांच के मीडिया के समक्ष पेश कर अपनी कसीदे पढऩे के चलन को अन्यायपूर्ण एंव विधि विरूद्ध बताया था। शिकायतकर्ता के अनुसार समस्त प्रदेश में कमोवेश 4० प्रतिशत मुकदमे झूठे पाये जाते है। ऐसे में किसी भी आरोपी को दोष सिद्ध होने से पूर्व मीडिया के समक्ष पेश किया जाना व अपराधी घोषित किया जाना अत्यन्त खेदपूर्ण है व समय समय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय एंव गृह विभाग द्वारा जारी दिशा निर्देशों के विरूद्ध है। उपरोक्त शिकायत के उत्तर में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक द्वारा पुलिस विभाग की मीडिया नीति के सम्बन्ध में एडवाइजरी होना तो स्वीकारा था परन्तु उसका पालन न किये जाने के सम्बन्ध में कोई संतोषजनक उत्तर नही दिया गया था।
उत्तराखण्ड मानव अधिकार आयोग द्वारा उपरोक्त शिकायत का संज्ञान लेते हुए पुलिस महानिदेशक को पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड एंव पुलिस अधीक्षक देहरादून को रिमाण्ड से पूर्व अभियुक्त के निजी विवरण और चेहरे ना सार्वजनिक करने के सम्बन्ध में शासन एंव पुलिस मुख्यालय स्तर पर राज्य के सभी थाने व चौकियों को उचित निर्देश जारी किये जाने के कड़े निर्देश जारी किये गये है। उक्त निर्देशों से आशा की जा सकती है कि पूर्व में उत्तराखण्ड पुलिस जोकि फर्जी इन्काउन्टर, राजीनिक द्वेष के चलते राजद्रोह के झूठे मुकदमे दर्ज करने और सम्पत्ति विवादों में लिप्त होने के चलते कई बार उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय से फटकार खा चुकी है के मनमाने रवैये पर रोक लगेगी।

LEAVE A REPLY