देहरादून(संवाददाता)। गली मौहल्लों में चालान काटने की परंपरा टूटने का नाम नहीं ले रही है। दून की हर मुख्य सड़क से कोई न कोई गली जुड़ती है। भोर का समय हो या सांझ का, वहां कोई न कोई खाकीधारी या नीली वर्दीधारी जवान दुपहिया वाहनों को रोकता हुआ नजर आ ही जाता है। ऐसा तब है जब प्रदेश के मुखिया ने खुद पुलिस के बड़े साहब को ऐसे फिजूल के चालान काटने की प्रक्रिया को रोकने के लिए कहा हुआ है। फिर भी न जाने क्यों शहर के एक साहब ने इस प्रक्रिया को जारी रखने का हुकम अपनी पुलिस को दे दिया? रह रहकर सवाल यहीं उठता है कि फरमान तो प्रदेश के मुखिया ने भी दिया था, उसको पुलिस कब मानेगी? पुलिस के बड़े साहब ने भी इस परंपरा को खत्म के लिए कहा था लेकिन छोटे साहब को तो ऐसा लगता है कि शायद करने से ही होगा…..
उत्तराखण्ड की प्रचंड बहुमत वाली सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी बड़े भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने के लिए ऑपरेशन चलाए हुए है। उन्होंने एसटीएफ, विजिलेंस सहित कुछ और एजेंसियों को इसका जिम्मा सौंपा हुआ है। सरकार की इस कार्रवाई ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया हुआ है। यहीं कारण है कि छोटे मोटे भ्रष्टाचारों की ओर किस ध्यान संभवत: जा ही नहीं रहा है। यह वो भ्रष्टाचार है जोकि सरकारी विभागों में और तो और सड़कों पर भी हो रहा है? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विभागीय बड़े अधिकारियों को भी यह भ्रष्टाचार नजर नहीं आ रहा है? गली मौहल्लों में दुपहिया वाहनों के चलान काटने की परंपरा को बंद करने की पहल प्रदेश के मुखिया और पुलिस विभाग के प्रमुख ने की थी। हालांकि कुछ अधिकारी शायद इस बात से सरोकार नहीं करते है? यहीं कारण है कि आज भी कुछ जनपदों की सड़कों यह परंपरा बदस्तूर जारी है। राजधानी दून में भी यह परंपरा फलफूल रही है, जिसको तोडऩा अब आवश्यक हो गया है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक बार फिर से पुलिस और आवाम के बीच इस परंपरा के चलते दूरी बननी शुरू हो गई है और अब खाकी वर्दी को देखकर आवाम एक बार फिर से सहमने लगा है? ऐसे में पुलिस अधिकारियों को चाहिए कि इस परंपरा पर विराम लगाकर कर आवाम और खाकी के मध्य मित्रता के सेतु का निर्माण करें?
