20-20 मैंचों पर शुरु हुआ सट्टा

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संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी के कुछ इलाकों में सट्टे का काला कारोबार बारह महीने ही चलता रहता है और सट्टे के इस बाजार पर पुलिस, एसओजी व एसटीएफ की नजरें सिर्फ तभी जाती हैं जब देश में 2०-2० मैच या आईपीएल मैच खेले जाते हैं। इन दिनों 2०-2० मैच का आगाज हो चुका है और राजधानी के कई इलाकों में चप्पे-चप्पे पर सट्टे के खिलाडी और बुकी अपने इस काले कारोबार को पुलिस की आंखों से बचाकर शातिराना अंदाज में खुलकर अंजाम दे रहे हैं। चर्चा यहां तक है कि इन मैचों पर आये दिन राजधानी के अन्दर ही करोडो रूपये का सट्टा लगता है और तो और राजधानी के शहरी क्षेत्र में लगभग एक दर्जन ऐसे बडे सट्टेबाज अपने इस गोरखधंधे को अंजाम दे रहे हैं जिनके ऊपर खाकी का ध्यान आज तक क्यूं नहीं गया यह हैरान करने वाली बात है? सट्टेबाज इतने शातिर हो चुके हैं कि उन्होंने अपने आपको पुलिस से सुरक्षित करने के लिए होटल, लॉज व बडी-बडी कोठियां दूर दराज किराये पर ले रखी हैं जहां वह खामोशी के साथ अपने इस धंधे को अंजाम देकर खूब दौलत कमा रहे हैं और तो और सट्टा किंग सट्टा खेलने वालों से मैच से पहले ही पैसे जमा करवा लेते हैं और मैच खिलाने वाले स्थल पर उनके पास सिर्फ मोबाइल और चैपटॉप के अलावा कुछ नहीं रहता जिससे कि अगर पुलिस व कोई भी एजेंसी उन्हें पकडे तो उनके पास पैसा न मिल पाये। ऐसे में शातिर सट्टेबाजों पर कैसे नकेल लग पायेगी यह समझ से परे है?
उल्लेखनीय है कि देश में 2०-2० मैच की शुरूआत हो चुकी है और यह सभी मैच क्रिकेट सट्टेबाजों और खिलाडियों के लिए मुफिद बन रहे हैं। हर मैच पर राजधानी के अन्दर बडा सट्टा लगना एक आम बात हो गई है और सट्टेबाज पुलिस व सभी एजेंसियों की आंखों में धूल झोकने के लिए सबसे पहले अपने पास नये फोन और नये मोबाइल नम्बर रखते हैं और उसी पर वह सट्टा खिलाने के लिए आगे आते हैं। चर्चा यहां तक है कि सट्टेबाजों को इस बात का इल्म हो चुका है कि हर मैच में पुलिस, एसओजी, एसटीएफ की टीमें उन्हें खंगालने के लिए मोबाइल नम्बरों को सर्विलांस पर रखती हैं और उनकी जरा सी चूक उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा देती है। यही कारण है कि सट्टेबाजों ने अपने मैच खिलाने के अंदाज को बडे शातिराना अंदाज से अंजाम देना शुरू कर रखा है। चर्चा यहां तक है कि सट्टेबाजों के खिलाडी उनकी पहचान के होते हैं इसलिए सट्टेबाज सट्टा खेलने वाले सभी खिलाडियों से पैसे जमा करा लेते हैं जितना उन्होंने सट्टा खेलना होता है। सट्टेबाज के गुर्गे सुबह से ही खिलाडियों से पैसा जमा कराने के लिए अपनी एक्टिवा से लेकर मोटर साइकिल पर निकल पडते हैं और सारा पैसा जमा करने के बाद वह सट्टे के किंग के पास यह पैसा जमा करा देते हैं जिसके बाद सट्टेबाज राजधानी से लेकर दिल्ली, चण्डीगढ़, पंजाब, उत्तर प्रदेश में कहीं पर भी अपने सट्टेबाजों को एक्टिव कर उन्हें मैच खिलाने के लिए आगे कर देता है जिससे कि पुलिस व पुलिस की एजेंसियों को किसी भी सट्टेबाज की भनक न लग पाये और वह सुरक्षित जोन में रहकर अपने सट्टे के काले कारोबार को आसानी से अंजाम दे दें। चर्चा यहां तक है कि राजधानी के अन्दर बडे सट्टेबाजों की लम्बीचौडी फौज मौजूद है लेकिन उसके बावजूद भी लगभग एक दर्जन बडे सट्टेबाजों को आज तक न तो पुलिस, एसओजी व एसटीएफ पकड पाई है जिससे सवाल खडे हो रहे हैं कि क्या इन एजेंसियों को इन बडे सट्टेबाजों की खबर नहीं मिलती या फिर वह इनके बारे में सबकुछ जानते हुए भी उन पर शिंकजा कसने के लिए आगे नहीं आना चाहती? सबसे अह्म बात तो यह है कि सट्टेबाजों को पकडने के बाद पुलिस उन पर मात्र गैमलिंग की धारा लगाती है और जब तक वह मीडिया के सामने अपने गुडवर्क का भौपू बजाती है तब तक सट्टेबाज को जमानत ही मिल जाती है और वह हाथ हिलाता हुआ सडकों पर धूमता हुआ दिखाई सिर्फ इसलिए देता है कि उसे ऐसी धाराओं में गिरफ्तार किया जाता है जो जमानत के पैमाने पर रहती हैं। ऐसे में क्रिकेट सट्टेबाजों को पकडकर पुलिस का इतराना हमेशा सवाल खडे करता है और यह भी सवाल पैदा कर रहा है कि जब सट्टेबाजी करते हुए कुछ लोग एक साथ पकडे जाते हैं तो उन पर गैंगेस्टर लगाने के लिए पुलिस आगे आना क्यूं नहीं चाहती?

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