मुख्यमंत्री को ऑनलाइन भेजा ज्ञापन

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संवाददाता
देहरादून। राष्ट्रीय रोजी रोटी अधिकार अभियान  ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को ईमेल द्वारा ज्ञापन सौंपा। इस अवसर पर रोजी रोटी अधिकार अभियान एक राष्ट्रीय मंच है, जिनके सदस्यों की पहल की वजह से की वजह से उच्चतम न्यायालय ने मई महीने में सभी राज्य सरकारों को राशन और खाने पर तुरंत कदम उठाने का निर्देश दिया था लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हो पाई है।
इस अवसर पर ज्ञापन में अभियान ने गंभीर चिंता व्यक्त की हैं कि उत्तराखंड में पोषण की आपात स्थिति बनने की सम्भावना है। मुफ्त राशन के बटवारे का स्वागत करते हुए ज्ञापन में उन्होंने लिखा कि यह कदम नाकाफी है। ज्ञापन में कहा गया है कि मई में किए गए एक सर्वे से पता चला है कि उत्तराखंड में मजदूरों, लौटे हुए युवाओं और छोटे किसानों की स्थिति बहुत गंभीर है। जिससे सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव बच्चों पर होने वाला है।
ज्ञापन में कहा गया है कि बीते दिनों उच्चतम न्यायालय ने गैर राशन कार्ड धारकों को राशन देने के लिए और ष्कम्युनिटी किचनष् (सामूहिक रसोई) खोलने के लिए हर राज्य सरकार को निर्देश दिया था।  इस आदेश का अमल उत्तराखंड में अभी तक शुरू नहीं हआ है।  ज्ञापन में कहा गया है कि रोजी रोटी अधिकार अभियान ने यह भी कहा कि राजनेताओं या जन प्रतिनिधियों द्वारा राशन किट देने के बजाय राशन का बंटवारा राशन दुकानों द्वारा ही होना चाहिए ताकि बंटवारा निष्पक्ष और पारदर्शी हो।  इसके अतिरिक्त आंगनवाड़ी और सरकारी स्कूल में पंजीकृत बच्चों को घर तक सिर्फ राशन ही नहीं पूरा पोषण का किट भेजने की जरूरत है।
राशन किट में दालों और तेल को शामिल करने का, और गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव भी ज्ञापन द्वारा दिया गया है। ज्ञापन में कहा गया है कि खाद्य के अधिकार पर काम करने वाले संगठनों के राष्ट्रीयव्यापी गठबंधन के रूप में हम अपनी चिंताएं व्यक्त करने के लिए ज्ञापन भेज रहे है। कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लेहर और कफ्र्यू का गहरा असर उत्तराखंड राज्य के लोगों के खाध और पोषण की पहुंच पर हुआ है। जिस प्रकार देश के दूसरे हिस्सों में देखने को मिला, राज्य में बड़े पैमानें पे कोपोषण और खाद्य सुरक्षा से वंचित होने का गंभीर परिणाम बच्चों पर होगा।
ज्ञापन में कहा गया है कि 9०० लोगो का एक सर्वे सोशल रिसर्च कलेक्टिव द्वारा उत्तराखंड में मई के तीसरे हफ्ते में किया गया, उसमे यह पाया गया की 83 प्रतिशत उत्तरदाता देहरादून में जो मजदूर थे और 93 प्रतिशत मजदूर और छोटे किसान रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल जिलों से यह बताते है कि उन्हें कम से कम एक खाद्य पदार्थ का सेवन कम करना पड़ा है और इस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है जो चिंता का विषय है।

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