उत्तराखण्ड में लम्बे अर्से से राजनेताओं की गुलामियत में मस्ते होते अफसर!

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मलाईदार पोस्टिंग के लिए रास आने लगे नेता
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में पिछले एक दशक से मलाईदार पोस्टिंग पाने की चाहत रखने वाले अफसरों को इस बात का इल्म हो गया था कि अगर वह कुछ राजनेताओं की चौखट पर दस्तक देकर उनकी गुलामी कबूल करेंगे तो उनकी हमेशा ही बल्ले-बल्ले होगी? उत्तराखण्ड में काफी अफसरशाही इसलिए बेलगाम है कि उन्हें कुछ राजनेताओं का खुला साथ मिला हुआ है और हद तो यहां तक है कि ऐसे अफसर आम जनमानस का फोन उठाना तो दूर राज्य के काफी अफसरों के भी वह फोन सुनने से परहेज करते हैं जिससे समझा जा सकता है कि आज राजनेताओं के आंगन में पलने वाले काफी अफसरों को सिस्टम के अन्दर कोई भय नहीं है कि अगर वह भ्रष्टाचार करेंगे तो उन पर कोई एक्शन होने वाला नहीं है। राजधानी में सामाजिक संगठनों ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर दो टूक कहा था कि अफसर नेताओं की गुलामी छोडे़ और जनता के लिए लड़ने वाले अफसरों की राज्य के अन्दर जरूरत है। काफी अफसर भले ही अवाम के बीच ईमानदारी का ढोल बजाते हों लेकिन यह साफ हो रखा है कि वह मलाईदार पोस्टिंग पाने के लिए किस तरह से कुछ बडे राजनेताओं की चौखट पर गुलामी का चौला ओढ़ रहे हैं।
उत्तराखंड में अफसरशाही की कार्यप्रणाली और अधिकारियों पर कथित राजनीतिक प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि प्रदेश में कुछ अधिकारी मनचाही पोस्टिंग और महत्वपूर्ण पदों पर बने रहने के लिए नेताओं की खुशामद करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। ऐसे आरोपों ने प्रशासनिक निष्पक्षता और जनता के प्रति अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि जिन अधिकारियों के कंधों पर कानून का पालन कराने और आम जनता को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी है, यदि वही राजनीतिक दबाव में फैसले लेने लगें तो गरीब और पीड़ित व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर आखिर किसके पास जाएगा? क्या सरकारी कुर्सी जनता की सेवा के लिए है या राजनीतिक प्रभाव रखने वालों के हित साधने के लिए? हाल ही में सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि के अवसर पर एक संस्थान की ओर से अधिकारियों को नेताओं की चापलूसी छोड़कर निष्पक्षता से काम करने की नसीहत दिए जाने की बात भी सामने आई थी। इस संदेश के बाद उत्तराखंड में अधिकारियों की नियुक्तियों, तबादलों और उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल और महत्वपूर्ण हो गए हैं।
प्रदेश में प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों का आधार योग्यता, अनुभव और कार्यक्षमता होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी को राजनीतिक नजदीकियों के आधार पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। ऐसी व्यवस्था में ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल भी प्रभावित होने की आशंका रहती है। सबसे गंभीर सवाल आम जनता के न्याय से जुड़ा है। एक तरफ सरकार पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन की बात करती है, दूसरी तरफ अफसरों पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने के आरोप व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती देते हैं। हालांकि, किसी विशेष अधिकारी की नियुक्ति या निर्णय में अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों की अभी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। उत्तराखंड को ऐसी अफसरशाही की जरूरत है जो नेताओं के व्यक्तिगत प्रभाव के बजाय संविधान और कानून के अनुसार काम करे। नियुक्तियों और तबादलों में स्पष्ट मानदंड तय हों, प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए और राजनीतिक हस्तक्षेप की शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो। ’आखिर कब तक सरकारी कुर्सियों पर नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक पहुंच के सवाल उठते रहेंगे? और कब ऐसी व्यवस्था बनेगी जिसमें अधिकारी की पहचान उसकी राजनीतिक नजदीकी नहीं, बल्कि ईमानदारी, निष्पक्षता और जनता के लिए किए गए काम से होगी?’

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