शूटआउट पर शूटआउट

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सैकडों मुठभेड़ के बाद भी बेखौफ दिखते अपराधी
कभी बिना गोली के भी कांपते थे क्रिमनल
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड को अपराधमुक्त करने का मुख्यमंत्री ने जो एक बडा सपना देखा था उसको लेकर राज्यवासियों के मन में आशा की किरण थी कि उनका उत्तराखण्ड जल्द अपराधमुक्त हो जायेगा। हैरानी वाली बात है कि उत्तराखण्ड के कुछ जिलों में पिछले कुछ वर्षों से सैकडों मुठभेड़ में छोटे-बडेघ् अपराधियों को गोलियां लगी लेकिन उसके बावजूद भी अपराध का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। मुठभेड़ में कौन छोटा-बड़ा अपराधी गोली लगने से अस्पताल की चौखट पर पहुंच रहा है इसको लेकर आम जनमानस के मन में कोई ऐसा उत्साह देखने को नहीं मिल रहा कि ऐसा होने से उत्तराखण्ड के अन्दर अपराधी कांपने लगा है। उत्तराखण्ड के अन्दर यह भी आवाज उठ रही है कि एक दौर वो भी था जब कुछ आईपीएस अफसरों के कार्यकाल में भले ही नाममात्र की मुठभेड़ की दास्तां सुनने को मिलती थी लेकिन उनका अपराधियों के मन में जो डर देखने को मिलता था उससे अपराधी भी अपराध करने से कांपते थे। आज भले ही गौकशी, लूट, चोरी करने वाले छोटे-छोटे अपराधियों के साथ पुलिस का शूटआउट होना राज्य को अपराधमुक्त की ओर ले जाता हुआ क्यों नजर नहीं आ रहा यह आज भी एक बडा सवाल खडा हुआ है।
उत्तराखण्ड को अपराधमुक्त बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता ने प्रदेशवासियों के भीतर एक उम्मीद जगाई थी कि देवभूमि में अपराध और अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। पुलिस ने भी अपराधियों के खिलाफ सख्त अभियान चलाए और अलग-अलग जिलों में पुलिस मुठभेड़ों की खबरें लगातार सामने आती रहीं। कई मामलों में आरोपियों के पैरों में गोलियां लगीं और उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन इन कार्रवाइयों के बीच एक सवाल अब और बड़ा होकर सामने खड़ा है क्या मुठभेड़ों की बढ़ती संख्या वास्तव में अपराध पर स्थायी अंकुश का प्रमाण बन पा रही है? किसी भी प्रदेश में पुलिस की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने अपराधी मुठभेड़ में घायल हुए। असली कसौटी यह भी है कि हत्या, लूट, चोरी, नशा तस्करी, महिला अपराध, संगठित अपराध और रंगदारी जैसी वारदातों में कितनी कमी आई, अपराधियों में कानून का कितना भय पैदा हुआ और आम आदमी स्वयं को कितना सुरक्षित महसूस कर रहा है।
उत्तराखण्ड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान गौकशी, चोरी, लूट, नशा तस्करी और अन्य अपराधों में वांछित आरोपियों के साथ पुलिस मुठभेड़ों की अनेक घटनाएं सामने आई हैं। पुलिस इसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करती रही है। इसके बावजूद यदि गंभीर अपराध लगातार सामने आते रहें तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि गोली का डर आखिर अपराध की जड़ तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? एक दौर ऐसा भी रहा है जब उत्तराखण्ड में कुछ पुलिस अधिकारियों की पहचान मुठभेड़ों की संख्या से अधिक उनकी पुलिसिंग, मुखबिर तंत्र, अपराधियों की निगरानी और संगठित गिरोहों पर पकड़ के लिए होती थी। उस समय मुठभेड़ों की खबरें अपेक्षाकृत कम सुनाई देती थीं, लेकिन पुलिस की मौजूदगी और कार्रवाई को लेकर अपराधियों में भय होने की चर्चा आम थी।
आज तस्वीर अलग दिखाई देती है। अपराधी पुलिस की गोली खाकर अस्पताल पहुंचता है, तस्वीर सामने आती है, पुलिस कार्रवाई सुर्खियां बनती है और कुछ समय बाद किसी दूसरे इलाके से फिर किसी बड़ी वारदात की खबर आ जाती है। ऐसे में जनता के मन में सवाल उठना लाजिमी है कि अपराध के खिलाफ लड़ाई कहीं केवल घटना के बाद की कार्रवाई तक तो सीमित नहीं होती जा रही? अपराधमुक्त उत्तराखण्ड का सपना केवल मुठभेड़ों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र, पेशेवर अपराधियों की लगातार निगरानी, अंतरराज्यीय गिरोहों की कमर तोड़ने, नशे के नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचने, लंबित मामलों में प्रभावी पैरवी और थाना-चौकी स्तर पर जवाबदेही की जरूरत है। अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन अपराध होने से पहले अपराधी की योजना को ध्वस्त कर देना प्रभावी पुलिसिंग की बड़ी कसौटी है। सवाल मुठभेड़ सही या गलत होने का नहीं है। कानून के दायरे में पुलिस को अपनी और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई का अधिकार है।
असली सवाल उसके परिणाम का है इतनी सख्ती के बाद अपराध का नेटवर्क कितना कमजोर हुआ? कितने पेशेवर गिरोह खत्म हुए? कितने अपराधियों ने उत्तराखण्ड छोड़ना बेहतर समझा? और सबसे महत्वपूर्ण क्या आम आदमी पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहा है? सरकार का लक्ष्य स्पष्ट है अपराधमुक्त उत्तराखण्ड। पुलिस की कार्रवाई भी लगातार दिखाई दे रही है। मगर इस लक्ष्य की वास्तविक सफलता का फैसला मुठभेड़ों की गिनती नहीं, बल्कि अपराध के आंकड़ों में लगातार गिरावट, बेहतर दोषसिद्धि, अपराधियों के नेटवर्क के खात्मे और जनता के भीतर पैदा हुआ सुरक्षा का भरोसा करेगा। क्योंकि खाकी का असली खौफ गोली चलने के बाद नहीं, अपराधी के अपराध करने से पहले उसके कदम ठिठक जाने में दिखाई देता है।

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