राजनेताओं के शिकारी बनेंगे स्टिंगबाज!

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मंच पर सियासत, पर्दे के पीछे कैमरा
2027 से पहले स्टिंग पर निगाहें
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जबसे जन्म हुआ है तबसे कुछ स्टिंगबाज कुछ राजनेताओं के शिकारी बनकर उनके विरोधियों को स्टिंग के मकडजाल में फसाने का खेल, खेलते आ रहे हैं और अब 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखण्ड के अन्दर स्टिंग करने में कुख्यात ने अपनी एक टीम के साथ कुछ राजनेताओं को अपने स्टिंग के जाल में फंसाने के लिए चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है और सवाल उठेंगे कि आखिर कौन कैमरा संभालेगा और कौन उसका शिकार बनेगा?
उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी तापमान बढ़ने लगा है और इसके साथ ही सत्ता के गलियारों में एक पुराना शब्द फिर बेचौनी पैदा कर रहा है ‘स्टिंग’। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल जहां अपने-अपने मोहरे बिछाने में जुटे हैं, वहीं राजनीतिक गलियारों में कैमरे और रिकॉर्डिंग के जरिए विरोधियों को घेरने की रणनीतियों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। हालांकि किसी नए स्टिंग ऑपरेशन की अभी स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। उत्तराखंड की राजनीति पहले भी देख चुकी है कि बंद कमरे की रिकॉर्डिंग बाहर आते ही सत्ता का पूरा गणित कैसे राष्ट्रीय सुर्खियों में पहुंच सकता है। 2016 का सियासी संकट और तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से जुड़ा कथित स्टिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा। विधायकों की बगावत के बीच सामने आई रिकॉर्डिंग ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था और मामला बाद में जांच एजेंसी तथा अदालत तक पहुंचा।
अब एक बार फिर सवाल उठ रहा है क्या 2027 की लड़ाई केवल जनसभाओं और चुनावी मंचों पर लड़ी जाएगी या कैमरे के पीछे भी राजनीतिक पटकथा तैयार होगी? विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ दावेदारों की संख्या बढ़ेगी, टिकट की लड़ाई तेज होगी और दलों के भीतर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी सामने आएगी। ऐसे माहौल में किसी नेता की पुरानी बातचीत, वीडियो, दस्तावेज या कथित रिकॉर्डिंग का चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल होने की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन असली सवाल रिकॉर्डिंग सामने आने का नहीं, उसकी प्रामाणिकता और मंशा का होगा। किसने रिकॉर्डिंग की? कब की? पूरी बातचीत क्या थी? क्या वीडियो एडिट हुआ? रिकॉर्डिंग करने वाले का राजनीतिक संबंध क्या है? और सबसे अहमकृउसे चुनाव से ठीक पहले सार्वजनिक करने का उद्देश्य क्या है? 2016 के घटनाक्रम ने उत्तराखंड को बता दिया था कि राजनीतिक संकट के बीच एक कथित स्टिंग कितना बड़ा मुद्दा बन सकता है। उस दौर में आरोप लगे, जवाब आए, राजनीतिक दल आमने-सामने हुए और मामला सीबीआई जांच तक पहुंचा। इसी इतिहास के कारण 2027 से पहले यदि कोई बड़ा राजनीतिक ऑडियो या वीडियो सामने आता है तो उसकी गूंज केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहने की संभावना कम होगी।
राजनीतिक स्टिंग का स्वरूप भी बदल चुका है। पहले छिपे कैमरे और लंबी रिकॉर्डिंग की जरूरत पड़ती थी। अब मोबाइल फोन की एक रिकॉर्डिंग कुछ मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। यही कारण है कि आने वाले चुनावी दौर में किसी भी सनसनीखेज ऑडियो-वीडियो पर सबसे पहले फोरेंसिक सत्यापन जरूरी होगा। बिना जांच किसी रिकॉर्डिंग को सच मान लेना जितना गलत होगा, उतना ही किसी प्रमाणित सामग्री को केवल राजनीतिक साजिश बताकर खारिज कर देना। उत्तराखंड में चुनावी बिसात अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। आने वाले महीनों में टिकट, दल-बदल, गुटबाजी, पुराने विवाद और एक-दूसरे के खिलाफ दस्तावेजों की राजनीति और तेज हो सकती है। ऐसे में एक सवाल अभी से सत्ता और विपक्ष दोनों के गलियारों में तैर सकता है। सामने बैठा व्यक्ति सिर्फ राजनीतिक साथी या विरोधी है… या उसकी जेब में रखा मोबाइल भी बातचीत रिकॉर्ड कर रहा है? 2027 का चुनाव किस दिशा में जाएगा, यह मतदाता तय करेंगे। लेकिन उत्तराखंड का पुराना राजनीतिक इतिहास इतना जरूर बताता है कि यहां चुनावी संघर्ष में कभी-कभी मंच पर बोले गए शब्दों से ज्यादा धमाका बंद कमरे में रिकॉर्ड हुई आवाज कर देती है।

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