विकास का इतिहास रचते धामी

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मैदान और पहाड़ों को गुलजार करते सीएम
देहरादून। युवा मुख्यमंत्री ने अपनी शपथ के दौरान राज्यवासियों के सामने संकल्प लिया था कि वह द्वेष भावना से सरकार नहीं चलायेंगे और राज्य को विकास के पथ पर इतनी तेजी से आगे ले जायेंगे जिससे राज्य की जनता को यह दिखाई दे कि उनका जो उत्तराखण्ड बाइस सालों से विकास की राह देख रहा था वह उत्तराखण्ड अब राज्य में हर तरफ विकास की उडान उडते हुए नये पथ पर प्रवेश कर चुका है। पहाड और मैदान को एकसाथ सजाने सवारने में मुख्यमंत्री ने जो धमक दिखाई है वह राज्यवासियों के लिए शुभ संकेत है और यही कारण है कि डबल इंजन के राज में उत्तराखण्ड आगे बढ़ रहा है और मुख्यमंत्री को यकीन है कि उनके विकास को देखते हुए राज्य की जनता 2027 में एक बार फिर भाजपा को सत्ता में लायेगी।
उत्तराखंड की सियासत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कम समय में फैसले लेने वाले मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है। राज्य गठन के बाद वर्षों से जिन मुद्दों पर आंदोलन हुए, बहस चली और सरकारों से समाधान की उम्मीद लगाई गई, उनमें से कई विषय धामी सरकार के कार्यकाल में एक बार फिर शासन के केंद्र में आए। कानून हो या जमीन, युवाओं का भविष्य हो या महिलाओं के अधिकार सरकार ने कई मामलों में कानूनी और नीतिगत बदलाव का रास्ता चुना। धामी की राजनीतिक शैली में एक बात लगातार दिखाई देती है कठिन और संवेदनशील मुद्दों को टालने के बजाय उन पर निर्णय की दिशा में आगे बढ़ना। यही कारण है कि उनके कार्यकाल में समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और भू-कानून जैसे विषय प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहे।
समान नागरिक संहिता धामी सरकार का सबसे चर्चित फैसला रहा। लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय रहे यूसीसी को उत्तराखंड में लागू किए जाने के बाद प्रदेश देशभर में चर्चा के केंद्र में आया। मुख्यमंत्री धामी ने इसे समान नागरिक अधिकारों से जुड़ा कदम बताया। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी ने उत्तराखंड के युवाओं के भरोसे को झटका दिया था। धामी सरकार ने नकल विरोधी कानून लाकर संगठित नकल और भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कठोर दंड का रास्ता अपनाया। सरकार ने इसके जरिए संदेश देने की कोशिश की कि सरकारी नौकरी के लिए मेहनत कर रहे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कानून सख्ती से काम करेगा। उत्तराखंड की जमीन बचाने की मांग वर्षों से आंदोलनों और जनबहस का हिस्सा रही है। धामी सरकार के कार्यकाल में भू-कानून में बदलाव की दिशा में कदम बढ़े और पहाड़ी जिलों की कृषि एवं उद्यान भूमि की खरीद से जुड़े प्रावधानों को सख्त किया गया। सरकार ने इसे राज्य की जमीन और संसाधनों के संरक्षण से जोड़ा।
उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक जीवन में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। सरकारी सेवाओं में राज्य की महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण को कानूनी आधार देने का फैसला भी धामी सरकार के कार्यकाल के प्रमुख निर्णयों में शामिल रहा। मुख्यमंत्री धामी की कार्यशैली में अधिकारियों के साथ लगातार समीक्षा बैठकों और योजनाओं को समयबद्ध पूरा करने के निर्देश भी प्रमुख रहे हैं। सड़क, चारधाम यात्रा, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और जनसमस्याओं से जुड़े मामलों में मुख्यमंत्री स्तर से लगातार समीक्षा सरकार की प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा रही है। उत्तराखंड के सामने चुनौती केवल विकास की नहीं, बल्कि विकास के साथ अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान को सुरक्षित रखने की भी है। धामी सरकार अपनी नीतियों को इसी संतुलन से जोड़ती रही है। धार्मिक पर्यटन और कनेक्टिविटी से लेकर निवेश और रोजगार तक सरकार प्रदेश की अर्थव्यवस्था को विस्तार देने की बात करती है।
उत्तराखंड के अब तक के सफर में हर सरकार और मुख्यमंत्री की अपनी भूमिका रही है। पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल की पहचान बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर कानून तथा नीतिगत निर्णयों को आगे बढ़ाने के प्रयास के रूप में उभरी है। इन फैसलों का अंतिम मूल्यांकन उनके दीर्घकालीन परिणामों से होगा, लेकिन धामी सरकार ने कई पुराने सवालों को दोबारा शासन की प्राथमिकता में जरूर ला खड़ा किया है। पहाड़ की उम्मीदों, युवाओं की आकांक्षाओं और बदलते उत्तराखंड की जरूरतों के बीच धामी सरकार अपने फैसलों के जरिए राज्य की अगली दिशा तय करने का दावा कर रही है।यह संस्करण पिछली कॉपी से ज्यादा फ्रंट-पेज और वरिष्ठ पत्रकार वाली भाषा में हैकृहेडिंग में “धामी”, सबहेडिंग में “धामी सरकार” और पूरी खबर में फैसलों को केंद्र बनाया गया है।

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