इंसाफ के लिए चौथी बरसी पर फिर उमड़ा आवाम
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। अंकिता भंडारी के हत्याकांड की चौथी बरसी पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कई जनपदों में आवाम उमड़ा और हर किसी के मन में इस बात को लेकर एक पीड़ा थी कि जब डबल इंजन सरकार बेटियों की सुरक्षा का दम भरती है तो फिर देश के अन्दर बेटियों के साथ कैसे अत्याचार हो रहे है। अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की लड़ाई आज भी कई संगठन इसलिए कर रहे हैं कि इस हत्याकांड में जिस वीआईपी का नाम सामने आया था और इस मामले में सीबीआई जांच भी चल रही है तो फिर उस वीआईपी के नाम से पर्दा आज तक न उठना कई सवालों को जन्म दे रहा है। अंकिता भंडारी की हत्या का दर्द आज भी पहाड़ से लेकर मैदान के लोगों में है भले ही हत्याकांड में शामिल गुनाहगारों को उम्रकैद की सजा हुई हो लेकिन अंकिता को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ने वालों में एक जुनून है कि जब तक हत्याकांड में वीआईपी को जेल नहीं भिजवा देंगे तब तक वह खामोश नहीं बैठेंगे।
अंकिता भंडारी हत्याकांड को चार साल बीत गए, लेकिन उत्तराखंड के जनमानस में उस घटना की टीस आज भी कम नहीं हुई है। चौथी बरसी पर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अंकिता को श्रद्धांजलि देने के लिए लोग जुटे। श्रद्धांजलि के साथ महिला सुरक्षा और हत्याकांड से जुड़े कथित ‘टप्च्’ प्रकरण को लेकर भी सवाल एक बार फिर मुखर हुए। अंकिता हत्याकांड में अदालत दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना चुकी है। इसके बावजूद इस मामले को लेकर चलने वाले आंदोलन पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। इसकी बड़ी वजह वह कथित ‘टप्च्’ एंगल है, जिसे लेकर अंकिता के परिजन और विभिन्न सामाजिक संगठन लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक इस पहलू को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, न्याय की उनकी लड़ाई जारी रहेगी। अंकिता की चौथी बरसी पर एक बार फिर वही सवाल सामने आया कि आखिर उस कथित ‘टप्च्’ को लेकर वर्षों से उठ रहे सवालों का अंतिम जवाब कब मिलेगा? मामले में सीबीआई जांच के चलते अब निगाह जांच एजेंसी पर भी टिकी हुई है। आंदोलन से जुड़े लोग चाहते हैं कि जांच में जो भी तथ्य सामने आएं, उन्हें स्पष्टता के साथ सामने लाया जाए और यदि किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका प्रमाणित होती है तो उसके खिलाफ भी कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।
इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस पूर्व में कथित टप्च् की संलिप्तता सामने नहीं आने की बात कह चुकी है। दूसरी ओर परिवार और आंदोलनकारी इस पहलू की गहराई से जांच की मांग करते रहे हैं। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति की भूमिका को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता, लेकिन इस मुद्दे पर उठ रहे सवाल आज भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। अंकिता की बरसी पर जुटे लोगों के बीच महिला सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। लोगों का कहना था कि सरकार महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात करती है, लेकिन ऐसी घटनाएं व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी करती हैं। किसी बेटी को न्याय दिलाने के लिए परिवार को वर्षों तक संघर्ष करना पड़े तो व्यवस्था के प्रति सवाल उठना स्वाभाविक है। अंकिता हत्याकांड ने चार साल पहले पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। पहाड़ से लेकर मैदान तक विरोध प्रदर्शन हुए और न्याय की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतरे। समय बीतने और दोषियों को सजा मिलने के बावजूद अंकिता का नाम प्रदेश में महिला सुरक्षा और न्याय की मांग से जुड़ा हुआ है।
अदालत से दोषियों को उम्रकैद मिलने को मामले में महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव माना गया, लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांग केवल दोषियों को सजा दिलाने तक सीमित नहीं रही। कथित टप्च् एंगल को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट निष्कर्ष भी सामने आना चाहिए। यही कारण है कि चौथी बरसी केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रही। अंकिता को याद करने पहुंचे लोगों ने न्याय की मांग को फिर आवाज दी। किसी के हाथ में अंकिता की तस्वीर थी तो किसी की जुबान पर महिला सुरक्षा का सवाल। चार साल बाद तस्वीर इतनी जरूर बदली है कि हत्याकांड के दोषियों को अदालत सजा सुना चुकी है, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में एक सवाल अब भी कायम हैकृकथित ‘टप्च्’ एंगल की जांच का अंतिम सच क्या है? अब इसका जवाब जांच और उसके निष्कर्ष से ही सामने आएगा। तब तक अंकिता के नाम पर उठती न्याय की आवाज उत्तराखंड की सड़कों से लेकर सामाजिक मंचों तक सुनाई देती रहेगी।