सरकारी जमीनें लीज पर देने को दहाड़े माहरा

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औने-पौने दाम पर बेच रही सरकारी जमीनें
सरकार बनने पर जमीनों को बेचने की कराएंगे जांच
देहरादून(नगर संवाददाता)। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चार्जशीट कमेटी के अध्यक्ष व सीडब्ल्यूसी के सदस्य करन माहरा ने सरकार को निशाने पर लेते हुए प्रथम चार्जशीट के माध्यम से मुख्यमंत्री नाम से प्रोपर्टी डीलर काम से के जरिये कहा है कि आज प्रदेश में सरकारी जमीनों को औने पौने दामों पर बाहरी लोगों को बेचने का काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सिडकुल के छरबा की 325 बीघा भूमि को छोटे उद्योगों को स्थापित करने के लिए दी जानी थी लेकिन जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि सरकार बनने पर पूरे मामलों की जांच कराई जाएगी और लीगल टीम इस मामले को न्यायालय में उठाएगी और चिपको आंदोलन की तर्ज पर इस मामले को जनता के बीच ले जाएंगे।
यहां राजपुर रोड स्थित एक होटल में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि पहले यह भूमि उत्तर प्रदेश के एक शिक्षण संस्थान को देने की कवायद हुई लेकिन लेन देन की बात नहीं बनी तो पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी को औने पौने दाम पर देने का काम किया गया। उन्होंने कहा कि बाजार मूल्य डेढ़ करोड़ रूपये प्रति बीघा है और सरकार ने 37 लाख 65 हजार रूपये प्रति बीघा से जमीन दे दी है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि औद्योगिक भूमि विक्रय करने के लिए पहले जमीन नीलाम करनी चाहिए थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि यदि एक करोड़ रूपये बीघा भी जमीन बिकती तो सरकार के पास 325 करोड़ मिल जाते परंतु सरकार ने 122.25 करोड़ में पूरी भूमि दे दी है और इसके लिए सर्किल रेट को रिवाइज किया गया। उन्होंने कहा कि औने पौने दाम पर जमीन बेचने पर सरकार को 122 करोड़ का चूना लगा है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस प्रकार के निर्णय नौनिहालों के भविष्य पर गहरा असर करेगा। उन्होंने कहा कि जब आम नागरिकों के लिए जमीन खरीदने की सीमा 250 वर्गमीटर है, तो सरकार किस नैतिकता के तहत चुनिंदा कॉर्पोरेट्स को सात हजार बीघा सरकारी जमीन 90 साल के लिए परोस रही है और व्यावसायिक उपयोग वाली इस बेशकीमती जमीन का किराया कृषि भूमि के सर्किल रेट पर तय कर सरकारी खजाने को चूना क्यों लगाया जा रहा है। क्या 90 साल की यह तथाकथित लीज भविष्य में इस जमीन को स्थायी स्वामित्व में बदलने का पिछला दरवाजा है। इस हजारों बीघा जमीन पर पहला हक स्थानीय युवाओं और पंचायतों का होना चाहिए था या बाहरी वैश्विक कंपनियों को दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले बोर्ड ने यह निर्णय डेढ़ साल तक जनता से क्यों छिपाया गया।
करन माहरा ने कहा कि यूआईआईडीबी राज्य में अवस्थापना विकास और निवेश परियोजनाओं के नियोजन व क्रियान्वयन का प्रमुख निकाय है। उन्होंने कहा कि इस बोर्ड की संरचना और नेतृत्व इसे अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं। उन्होंने कहा कि बोर्ड के अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री होने के कारण इस पूरी नीति की प्रत्यक्ष राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हुई है। माहरा ने कहा है कि सरकार ने उद्यान विभाग, पोटैटो प्रोजेक्ट, ब्रीडिंग गार्डन और अन्य विभागों की लगभग सात हजार बीघा खाली या कम-उपयोग वाली सरकारी भूमि को चिन्हित कर एक लैंड बैंक तैयार किया गया है। इसे निजी निवेशकों को सौंपने के लिए तय किए गए प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं। बेशकीमती सरकारी जमीनों को 90 वर्ष तक की दीर्घकालीन लीज पर देने का प्रावधान, जो सामान्य वाणिज्यिक लीज (आमतौर पर 30 वर्ष) से कहीं अधिक है। फाइव-स्टार होटल, लग्जरी रिसॉर्ट, विला, कमर्शियल टाउनशिप, वेलनेस सेंटर और प्राइवेट स्कूल जैसी परियोजनाएं है। उन्होंने कहा कि लीज पर ली गई भूमि को आगे सब-लीज पर देने की अनुमति और इसे बंधक रखकर बैंकों से भारी ऋण लेने की खुली छूट दी है। उन्होंने कहा कि कंपनी का न्यूनतम वार्षिक टर्नओवर रूपये 500 करोड़ (पिछले तीन वर्षों का) तथा न्यूनतम नेटवर्थ रूपये 60 करोड़ होने के साथ ही प्रीमियम हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में कम से कम एक हजार कमरों के संचालन का अनुभव आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि शर्तें बडे कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए लगाई गई हैं। उन्होंने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सर्किल रेट का खेल (राजस्व हानि)ः इन जमीनों का उपयोग पूर्णतः व्यावसायिक होटल, रिसॉर्ट, टाउनशिप उद्देश्यों के लिए होना है, लेकिन सरकार निजी कंपनियों से लीज रेंट का निर्धारण कृषि भूमि के सर्किल रेट पर करने जा रही है। वाणिज्यिक और कृषि दरों के इस भारी अंतर के कारण सरकारी खजाने को करोड़ों की चपत लगने और कंपनियों को औने-पौने दामों पर जमीन मिलने का गंभीर आरोप है। उन्होंने कहा कि भू-कानून की मूल भावना के विपरीत दोहरा मापदंड अपना रही है। उन्होंने कहा कि एक ओर राज्य की जनता वर्षों से बाहरी लोगों और कंपनियों के माध्यम से भूमि खरीद पर रोक लगाने वाले सख्त भू-कानून की मांग करती रही है जिसके तहत 2025 का नया भू-कानून लाया गया, जिसमें आम नागरिकों के लिए आवासीय सीमा 250 वर्गमीटर तय की गई है, वहीं दूसरी ओर सरकार स्वयं बड़े कॉर्पोरेट घरानों को हजारों बीघा सरकारी जमीन 90 साल के लिए परोस रही है।
उन्होंने कहा कि फ्री-होल्ड में बदलने की आशंका व आलोचकों के अनुसार वर्तमान में यह लीज होल्ड आधार पर दी जा रही है, किंतु भविष्य में इसे फ्री-होल्ड (स्थायी स्वामित्व) में परिवर्तित किए जाने की पूरी संभावना है, जो अस्थाई लीज को हमेशा के लिए निजी हाथों में तब्दील कर सकती है। उन्होंने कहा कि स्थानीय अधिकारों की अनदेखीः सामूहिक उपयोग की सरकारी भूमि पर पहला हक स्थानीय युवाओं, ग्राम पंचायतों या सहकारी संस्थाओं का होना चाहिए था, न कि वैश्विक कॉरपोरेट्स का होना चाहिए इसका पुरजोर विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नोएडा अथॉरिटी ने सिक्का डेवलपर्स के विरुद्ध रूपये 277 करोड़ की भारी-भरकम रिकवरी के आदेश जारी किए गए हैं। अथॉरिटी ने कंपनी के 31 फ्लैट सील किए जाने के बावजूद उस पर अभी भी रूपये 208 करोड़ की देनदारी शेष है। वित्तीय धोखाधड़ी और नियमों के उल्लंघन के चलते इस कंपनी के विरुद्ध देश के अन्य राज्यों में भी गंभीर मुकदमे दर्ज हैं। कंपनी ने भूमि आवंटन से जुड़े अनुबंधों और शर्तों का अनुपालन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि जॉर्ज एवरेस्ट जाने वाली सार्वजनिक सड़क पर टोल फीस वसूली को लेकर भी विवाद सामने आया। अंततः उत्तराखंड हाईकोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और सार्वजनिक सड़क पर टोल कलेक्शन पर रोक लगाई गई। कांग्रेस का सवाल है कि यदि सार्वजनिक सड़क पर जवसस वसूलने का अधिकार नहीं था, तो ऐसी वसूली की स्थिति पैदा कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है। पत्रकार वार्ता में सह प्रभारी सुरेंद्र शर्मा, प्रदेश महामंत्री संगठन राजेन्द्र भंडारी, अमरजीत सिंह, मनोज रावत, डॉ. प्रेम बहुखंडी, डॉ प्रतिमा सिंह, अभिनव थापर भी उपस्थित रहे।

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