जमीन खरीदना बना जोखिम का सौदा!

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रिकॉर्ड की गड़बड़ी से बढ़ रहे विवाद
जमीन के कागज डिजिटल हुये, इंसान की मुश्किलें कब होंगी कम
उत्तराखण्ड में जमीन के कागजों की उलझन कब सुलझेगी?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में जमीन खरीदना एक लम्बे दशक से जोखिम का सौदा बना हुआ है क्योंकि रिकॉर्ड की गड़बड़ी से जमीनों के विवाद इतने बढ़ते जा रहे हैं जिसकी कोई कल्पना भी नहीं की जा सकती। हैरानी वाली बात तो यह है कि जब कोई व्यक्ति जमीन खरीदता है तो उसे यह इल्म रहता है कि रजिस्ट्री उसके नाम हो गई है तो उसका असली मालिक वह है। हालांकि फर्जी दस्तावेजों के सहारे उसी जमीन को कोई भी अपना बताने के लिए आगे आ जाता है और उसके बाद ऐसी जमीनों को लेकर जो विवाद तहसीलों में शुरू होता है उसका अंत कब होगा इसका पता उस व्यक्ति को भी नहीं लग पाता जिसने पैसे देकर जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम कराई थी। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जमीन के कागजात तहसील में तो डिजिटल तो हुये लेकिन आम आदमी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। गजब की बात तो यह है कि कागज में जमीन कुछ और होती है और मौके पर कुछ और ऐसे में बहस चलती आ रही है कि आखिर भूमि रिकॉर्ड का खेल कब सुधरेगा जिससे आम जनमानस को अपनी ही जमीन को अपनी बताने में एक अर्सा न बीत पाये। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिरकार जमीन के कागजों की उलझन कब सुलझेगी क्योंकि सिस्टम बदला लेकिन व्यवस्था बदलते हुए नजर नहीं आ रही है।
उत्तराखंड में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी है। पहाड़ में पुश्तैनी जमीन हो या मैदान में वर्षों की कमाई से खरीदा गया छोटा-सा भूखंड एक गलत रिकॉर्ड, अधूरा सीमांकन या कागजों में दर्ज छोटी-सी त्रुटि परिवारों को वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर कटवा सकती है। सवाल यह है कि जब राजस्व रिकॉर्ड लगातार डिजिटल किए जा रहे हैं, व्यवस्थाएं ऑनलाइन हो रही हैं और सरकारी तंत्र पारदर्शिता का दावा कर रहा है, तो जमीन से जुड़े विवाद और आम आदमी की परेशानी कम क्यों नहीं हो रही? सबसे बड़ी समस्या भूमि रिकॉर्ड और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की है। कागज में जमीन का रकबा कुछ और, मौके पर स्थिति कुछ और ऐसी शिकायतें राजस्व विभाग के सामने आती रहती हैं। कई मामलों में सीमांकन वर्षों तक लंबित रहता है। विरासत दर्ज कराने, नामांतरण कराने या पुराने रिकॉर्ड को दुरुस्त कराने के लिए लोगों को कई स्तरों पर दौड़ना पड़ता है।
दूसरी चुनौती जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़ी है। आम आदमी अक्सर राजस्व कानूनों और भू-अभिलेखों की तकनीकी बारीकियों से परिचित नहीं होता। वह दस्तावेज देखकर जमीन खरीद लेता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि रास्ते, सीमा, स्वामित्व, बंधक, सरकारी भूमि या अन्य दावों से जुड़ी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। ऐसे मामलों में नुकसान सिर्फ खरीदार का नहीं होता, बल्कि न्यायालयों और प्रशासन पर भी विवादों का बोझ बढ़ता है। उत्तराखंड में तेजी से बढ़ता शहरीकरण इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में जमीन की कीमतें बढ़ने के साथ भूखंडों की खरीद-बिक्री भी बढ़ी है। ऐसे में भूमि रिकॉर्ड की शुद्धता और तत्काल सत्यापन पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। सरकार को अब केवल रिकॉर्ड डिजिटल करने से आगे बढ़ना होगा। प्रत्येक जमीन का ऐसा एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होना चाहिए, जिसमें स्वामित्व, खसरा-खतौनी, नक्शा, सीमांकन, रास्ता, बंधक और संबंधित न्यायिक विवाद जैसी महत्वपूर्ण जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध हो। जमीन खरीदने वाला व्यक्ति भुगतान करने से पहले स्वयं सत्यापन कर सकेकृयह व्यवस्था आम आदमी को बड़े विवादों से बचा सकती है।
इसी तरह लंबित सीमांकन और नामांतरण के लिए समय-सीमा तय होनी चाहिए। यदि कोई आवेदन निर्धारित अवधि में निस्तारित नहीं होता तो उसकी जिम्मेदारी भी तय हो। राजस्व अदालतों में वर्षों से लंबित भूमि विवादों के लिए अलग अभियान चलाने की जरूरत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जमीन के मामले में पारदर्शिता केवल सरकारी रिकॉर्ड में नहीं, जमीन पर भी दिखाई देनी चाहिए। डिजिटल नक्शा तभी उपयोगी है, जब वह वास्तविक स्थिति से मेल खाए। उत्तराखंड में विकास जरूरी है, लेकिन विकास की नींव जमीन पर ही टिकती है। इसलिए भूमि व्यवस्था को सिर्फ राजस्व विभाग का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह किसान, कारोबारी, प्रवासी, निवेशक और हर उस परिवार का सवाल है जिसकी मेहनत की कमाई जमीन में लगी है। सरकार यदि भूमि रिकॉर्ड को सटीक, सीमांकन को समयबद्ध और जमीन की खरीद को पूरी तरह पारदर्शी बना दे, तो हजारों विवाद पैदा होने से पहले ही खत्म किए जा सकते हैं। आखिर आम आदमी को अपनी ही जमीन के कागज समझने और साबित करने में पूरी जिंदगी नहीं लगनी चाहिए।

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