थानों में पड़ी फरियादों का कौन लेगा हिसाब?

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गरीब फरियादी को रिसीविंग तक नहीं तो फिर न्याय की किससे उम्मीद?
आखिर पुलिस मुख्यालय कब अपना खोलेगा तीसरा नेत्र!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में शुद्धिकरण का मामला राज्य से लेकर देशभर में इसलिए भी गरमा रखा है कि एक ओर तो ससंद में नेता प्रतिपक्ष ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के अपमान पर दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग उठाई और साफ कहा था कि एफआईआर तो दर्ज करनी पडेगी लेकिन हल्द्वानी पुलिस ने जब एससीएसटी मामले में राहुल पर ही एससीएसटी का मुकदमा दर्ज किया तो उससे देशभर में पुलिस की इस कार्यवाही को लेकर आक्रोश दिखाई दे रहा है। पुलिस की एकतरफा कार्यवाही को लेकर उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक उत्तराखण्ड सरकार के खिलाफ खुला मोर्चा खोल चुकी है। वहीं राज्य के कई जनपदों की पुलिस पर यह उंगलियां उठ रही हैं कि वह काफी फरियादियों को तो उसकी शिकायत की रिसीविंग भी नहीं देती और अगर फरियादियों की शिकायत रिसीव कर भी ली जाती हैं तो पुलिस उस पर जांच की बात कहकर मुकदमा दर्ज करने के लिए आगे नहीं आती जिससे सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिर एक गरीब इंसान की शिकायत सुनेगा तो आखिर कौन सुनेगा? सवाल खडे हो रहे हैं कि पुलिस मुख्यालय कब अपना तीसरा नेत्र खोलकर यह पता लगायेगा कि राज्य के जनपदों में कितने फरियादियों ने अपनी शिकायत दी और कितनो पर मुकदमा कायम कर एक्शन लिया गया।
उत्तराखंड में पुलिस को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए बड़े-बड़े आदेश जारी होते हैं। फरियादी की शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई की बात कही जाती है। व्यवस्था यह कहती है कि शिकायत को गंभीरता से लिया जाएगा, जरूरत पड़ने पर मुकदमा दर्ज होगा और पीड़ित को न्याय दिलाने की कोशिश होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था कागज से निकलकर थाने की चौखट तक पहुंची भी है? जरा किसी थाने में जाकर वहां पड़े पुराने प्रार्थना पत्रों और शिकायतों का हिसाब देख लिया जाए। कितनी शिकायतें आईं, कितनों पर जांच हुई, कितनों पर मुकदमा दर्ज हुआ और कितने आवेदन आज भी कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं अगर इसका ईमानदारी से ऑडिट हो जाए तो तस्वीर बहुत कुछ कह सकती है।
सबसे बड़ा सवाल उस गरीब आदमी का है, जो बड़ी उम्मीद लेकर थाने पहुंचता है। जिसके पास न कोई राजनीतिक पहुंच है, न किसी बड़े अधिकारी का फोन और न ही अपनी बात मनवाने की ताकत। वह हाथ में एक प्रार्थना पत्र लेकर पुलिस के दरवाजे पर खड़ा होता है। उसे उम्मीद होती है कि कानून उसकी सुनेगा लेकिन अगर उसी व्यक्ति की शिकायत रिसीव ही न हो, उसे प्राप्ति न मिले या उसकी फरियाद कार्रवाई के इंतजार में फाइलों के नीचे दब जाए, तो वह आखिर जाए कहां? क्या कानून का दरवाजा सिर्फ प्रभावशाली लोगों के लिए खुला है? यह सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस भरोसे को बचाने के लिए है जिस पर ‘मित्र पुलिस’ की पूरी अवधारणा टिकी है। पुलिस का असली चेहरा सिर्फ अपराधी पकड़ने और प्रेस नोट जारी करने से नहीं बनता। असली परीक्षा तब होती है जब कोई पीड़ित व्यक्ति थाने पहुंचता है। वह कितना सम्मान पाता है, उसकी बात कितनी गंभीरता से सुनी जाती है और उसकी शिकायत पर कितनी जल्दी कार्रवाई होती है यहीं से पुलिस और जनता के बीच भरोसा बनता या टूटता है।
अगर किसी शिकायत पर मुकदमा बनता है तो कार्रवाई होनी चाहिए। अगर शिकायत जांच योग्य है तो जांच समयबद्ध होनी चाहिए। और अगर शिकायत में अपराध नहीं बनता तो फरियादी को स्पष्ट कारण बताया जाना चाहिए। लेकिन शिकायत को चुपचाप दबाकर रख देना किसी भी स्थिति में स्वस्थ व्यवस्था की निशानी नहीं हो सकती। अब जरूरत केवल नए आदेश की नहीं है। जरूरत है पुराने आदेशों की जमीन पर पड़ताल की। पुलिस मुख्यालय अचानक सभी थानों का रिकॉर्ड मंगाए। देखा जाए कि कितने प्रार्थना पत्र लंबित हैं, कितने मामलों में समय पर कार्रवाई हुई, कितने मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ और कितने फरियादियों को उनकी शिकायत की विधिवत प्राप्ति दी गई और यह जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे। कुछ फरियादियों से सीधे पूछा जाए कि उनकी शिकायत का क्या हुआ। तब शायद असली तस्वीर सामने आएगी।
मुख्यमंत्री को भी इस विषय पर गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। क्योंकि कानून-व्यवस्था का मतलब केवल अपराधियों पर कार्रवाई करना नहीं है। कानून-व्यवस्था का पहला मतलब यह है कि आम आदमी को यह भरोसा हो कि उसकी आवाज सरकार और पुलिस तक पहुंच सकती है। जिस गरीब की आवाज थाने के दरवाजे पर ही अनसुनी हो जाए, उसके लिए लोकतंत्र और कानून की किताबों में लिखे अधिकार का क्या मतलब रह जाता है? उत्तराखंड पुलिस को अपनी व्यवस्था की ईमानदार समीक्षा करनी होगी। आदेश जारी करना आसान है, उनका पालन करवाना असली चुनौती है। अब समय आ गया है कि थानों में रखे हर प्रार्थना पत्र का हिसाब हो। हर फरियादी को उसकी शिकायत की प्राप्ति मिले। हर शिकायत पर नियमानुसार कार्रवाई हो और लापरवाही मिलने पर जिम्मेदारी भी तय हो। क्योंकि सवाल सिर्फ एक प्रार्थना पत्र का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसके सहारे एक आम आदमी पुलिस के दरवाजे तक पहुंचता है और अगर वही भरोसा टूट गया तो फिर ‘मित्र पुलिस’ का नारा दीवारों और प्रेस नोटों तक ही सीमित रह जाएगा?

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