चालान से नहीं सुधरेगा ट्रैफिक!

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शहरों को चाहिए ‘सिस्टम’
सड़क पर पुलिस, चौराहों पर कैमरे, फिर भी जाम जस का तस
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड के अधिकांश जनपदों के शहरों में ट्रैफिक अब व्यवस्था की समस्या से आगे बढ़कर शहरी नियोजन की परीक्षा बन चुका है। सड़क पर गाड़ी बढ़ रही है, शहर फैल रहा है, बाजार सघन हो रहे हैं और पार्किंग की जगह घटती जा रही है। दूसरी तरफ यातायात व्यवस्था का सबसे आसान जवाब आज भी वही है चालान काटिए। नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। बिना हेलमेट, गलत दिशा में वाहन चलाना, नशे में ड्राइविंग, खतरनाक ड्राइविंग और गलत पार्किंग पर सख्ती जरूरी है। लेकिन क्या हर जाम का कारण नियम तोड़ने वाला चालक ही है? अगर एक चौराहे पर रोज सुबह जाम लगता है, तो वहां रोज चालान काटना समाधान नहीं है। वह इस बात का प्रमाण है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने की कोशिश नहीं हुई।
किसी शहर का ट्रैफिक सिर्फ पुलिस नहीं संभाल सकती। इसके लिए जिला प्रशासन, नगर निकाय, लोक निर्माण विभाग, परिवहन विभाग और यातायात पुलिस को एक साथ बैठना होगा। सड़क कहां चौड़ी होनी है, पार्किंग कहां बनेगी, वन-वे कहां होगा, सिग्नल का समय कितना होगा, सार्वजनिक परिवहन किस रूट पर चलेगा और पैदल यात्रियों के लिए जगह कहां होगी, इन सवालों का जवाब एक समग्र ट्रैफिक प्लान में होना चाहिए। आज स्थिति यह है कि सड़क के किनारे पार्किंग की जगह नहीं, इसलिए वाहन सड़क पर खड़े हैंय सड़क पर वाहन खड़े हैं, इसलिए जाम हैय जाम है तो चालान है। इस पूरे चक्र में मूल समस्या वहीं खड़ी रहती है। पर्यटन सीजन में स्थिति और गंभीर हो जाती है। दूसरे राज्यों से आने वाले हजारों वाहन अचानक शहरों और पहाड़ी मार्गों पर पहुंचते हैं। तब रूट डायवर्जन, पार्किंग, शटल सेवा और वैकल्पिक मार्गों की तैयारी शुरू होती है। सवाल यह है कि पर्यटन सीजन कोई अचानक आने वाली आपदा तो है नहीं। इसकी तारीखें पहले से पता होती हैं। फिर तैयारी आखिरी समय में क्यों?
ट्रैफिक प्रबंधन में तकनीक का इस्तेमाल भी केवल चालान तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिस चौराहे पर रोज किस समय कितना ट्रैफिक आता है, यह डेटा कैमरों और सेंसर से पता चल सकता है, वहां उसी डेटा के आधार पर सिग्नल और रूट व्यवस्था क्यों नहीं बदली जा सकती? और सबसे बड़ा सवालकृक्या हम सड़क बना रहे हैं या सिर्फ वाहनों के लिए जगह बना रहे हैं? शहर की सड़क पर कार के लिए जगह है, लेकिन पैदल चलने वाले के लिए फुटपाथ नहीं। बाजार में दुकानों के लिए जगह है, लेकिन पार्किंग नहीं। नए भवन बन रहे हैं, लेकिन उनके ट्रैफिक प्रभाव का हिसाब कितना रखा जा रहा है? यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को कठोर निर्णय लेने होंगे।
शहर को जितने वाहन मिल रहे हैं, उतनी सड़कें बनाना हमेशा संभव नहीं। इसलिए समाधान केवल सड़क चौड़ी करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, पार्किंग नीति लागू करना, पैदल और साइकिल यातायात के लिए सुरक्षित स्थान बनाना और अनावश्यक वाहन निर्भरता कम करना भी है। पुलिस की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। यातायात पुलिस का मूल्यांकन सिर्फ चालान की संख्या से नहीं, बल्कि जाम कम करने और दुर्घटनाएं घटाने की क्षमता से होना चाहिए। अगर किसी अधिकारी के क्षेत्र में हर दिन एक ही जगह जाम लगता है तो रिपोर्ट में यह नहीं लिखा जाना चाहिए कि ‘यातायात पुलिस तैनात रही’। सवाल होना चाहिएकृजाम क्यों लगा और उसे स्थायी रूप से खत्म करने के लिए क्या किया गया? उत्तराखंड को अब ‘अभियान आधारित ट्रैफिक व्यवस्था’ से बाहर निकलना होगा। हर कुछ दिन में चेकिंग, चालान और अभियान से तस्वीर कुछ समय के लिए बदल सकती है, शहर की यातायात समस्या नहीं।
सरकार विकास के साथ स्मार्ट और आधुनिक शहरों की बात करती है। स्मार्ट शहर का मतलब सिर्फ सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल सिस्टम नहीं है। स्मार्ट शहर वह है जहां नागरिक को रोज सड़क पर अपनी आधी जिंदगी जाम में न गंवानी पड़े। इसलिए अब सवाल चालान का नहीं, नीति का है। कितने चालान हुए यह आंकड़ा छोटा है। कितने लोगों का समय बचा यह बड़ा आंकड़ा है। उत्तराखंड के शहरों में अब ऐसी यातायात नीति चाहिए जो जाम लगने के बाद रास्ता खोलने के बजाय जाम पैदा होने की वजह को खत्म करे। क्योंकि आखिर कब तक शहर की हर यातायात समस्या का जवाब एक ही रहेगा। “चालान कर दिया गया है।” जनता को चालान की रसीद नहीं, व्यवस्थित सड़क और सुरक्षित सफर चाहिए।

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