नेपाल की तबाही से सीएम अलर्ट

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धामी ने पढ़ी हिमालय की खामोशी
संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर बढ़ाई नजर
देहरादून। उत्तराखण्ड से लगे नेपाल में अचानक बाढ़ से आई दिल दहला देने वाली तबाही ने उत्तराखण्ड जैसे हिमालय राज्य को एक चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने अपने ग्लेशियरों पर चिंता न दिखाई तो उसका परिणाम भी उत्तराखण्ड में घातक हो सकता है। नेपाल में आई तबाही में सैकडों लोगों की मौत के दृश्य ने मुख्यमंत्री के माथे पर चिंता की लकीरें डाल दी और यही कारण है कि युवा मुख्यमंत्री ने नेपाल में आई इस तबाही से एक बडा सबक ले लिया है। मुख्यमंत्री ने तेरह ग्लेशियर झीलों पर अपनी नजर लगा दी है और उन्होंने एक बडे विजन के साथ हिमालय की खामोशी को पढ़ा है और वह अफसरों को दो टूक संदेश दे रहे हैं कि आपदा का इंतजार नहीं करना और खतरे से पहले सारी तैयारियां पूरी रहनी चाहिए। इसी को लेकर मुख्यमंत्री ने ग्लेशियर झीलों की निगरानी को अपनी प्राथमिकता में शामिल कर लिया है और उनका मानना है कि उत्तराखण्ड की जनता उनका परिवार है और इस परिवार की ऐसी तबाहियों को देखकर उनकी सुरक्षा का चक्रव्यूह तैयार करना उनकी पहली प्राथमिकता बन गया है।
पड़ोसी देश नेपाल में अचानक आई बाढ़ और उससे मची भारी तबाही ने हिमालयी राज्यों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। पहाड़ों में बदलते मौसम, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों के बढ़ते जोखिम के बीच उत्तराखंड सरकार ने अब खतरे को टालने के बजाय पहले से पहचानने और उससे निपटने की तैयारी तेज कर दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। सरकार ने 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों को चिन्हित करते हुए इनके नियमित वैज्ञानिक सर्वे, जलस्तर और झीलों के आकार में होने वाले बदलावों की निगरानी तथा संभावित खतरों का आकलन करने पर जोर दिया है। इसके साथ ही आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं। दरअसल, हिमालयी क्षेत्र में किसी ग्लेशियर झील का अचानक टूटना केवल पहाड़ तक सीमित रहने वाली घटना नहीं होती। कुछ घंटों में निकलने वाला पानी नीचे बसे गांवों, सड़कों, पुलों और नदी किनारे की बस्तियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। यही वजह है कि अब आपदा प्रबंधन की रणनीति का फोकस केवल घटना के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं रह सकता।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है। उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां पहले से ही भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। धामी सरकार का यह कदम इसी बदलती चुनौती के बीच ‘आपदा आने का इंतजार करने’ के बजाय ‘खतरे को पहले पहचानने’ की नीति की ओर संकेत करता है। वैज्ञानिक निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम प्रभावी ढंग से जमीन पर उतरते हैं तो संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को समय रहते चेतावनी दी जा सकती है और बड़े नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हालांकि चुनौती सिर्फ सिस्टम लगाने की नहीं है। असली परीक्षा उसकी लगातार निगरानी, तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर तत्काल निर्णय और चेतावनी मिलने पर स्थानीय प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया की होगी। पहाड़ों में आपदा के दौरान कुछ मिनट भी कई बार जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन जाते हैं। इसलिए मुख्यमंत्री के निर्देशों को महज सरकारी आदेश मानकर फाइलों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें मैदानी स्तर पर लगातार मॉनिटरिंग और जवाबदेही से जोड़ना होगा। संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की स्थिति की नियमित रिपोर्ट, संभावित खतरे वाले इलाकों की पहचान और स्थानीय स्तर पर बचाव की तैयारियां समय से पूरी करना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।
नेपाल की त्रासदी ने एक बार फिर बता दिया है कि हिमालय चेतावनी नहीं देता, सीधे परीक्षा लेता है। ऐसे में उत्तराखंड के लिए सबसे बेहतर रणनीति यही है कि खतरा सामने आने से पहले तैयारी पूरी हो। धामी सरकार का ग्लेशियर झीलों पर बढ़ता फोकस इसी दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है अब जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक चेतावनी से लेकर प्रशासनिक कार्रवाई तक पूरी व्यवस्था एक ही गति से काम करे।

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