उत्तराखण्ड में रिश्वतखोरी पर कब लगेगा अंकुश
‘नजराने’ के बिना क्यों अटक रहे सरकारी काम?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावे लगातार किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो रिश्वतखोरी का रोग खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। विभाग कोई भी हो राजस्व, पुलिस, परिवहन, नगर निकाय, तहसील, विकास प्राधिकरण या अन्य सरकारी कार्यालय आम आदमी का काम करवाने के लिए कथित तौर पर ‘सुविधा शुल्क’ की मांग की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के खिलाफ पांच साल से बड़ा ऑपरेशन चला रखा है और हैरानी वाली बात है कि सरकार के सख्त रूख के चलते अधिकांश सरकारी महकमों में रिश्वतखोरी का शातिराना खेल बंद होने का नाम नहीं ले रहा है जिससे आम जनमानस के मन में रिश्वतखोरों के खिलाफ एक बडी नाराजगी पनपती आ रही है। सवाल पनप रहे हैं कि आखिरकार उत्तराखण्ड के अधिकांश सरकारी महकमों में ‘नजराने’ के बिना क्यों सरकारी काम अटक रहे हैं यह आम जनमानस को एक बड़ा दर्द दे रहा है। सैकड़ों रिश्वतखोरों के जेल जाने के बावजूद उत्तराखण्ड में रिश्वतखोरी का बढ़ता जाल सरकार के लिए चिंता का विषय होगा और उसके जहन में यह बात भी जरूर उभर रही होगी कि आखिर उत्तराखण्ड में रिश्वतखोरी पर कब लगाम लग पायेगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकारी काम के लिए रिश्वत क्यों देनी पड़े? जिस काम के लिए कर्मचारी और अधिकारी को सरकार वेतन देती है, उसी काम को करवाने के लिए जनता से अतिरिक्त रकम मांगना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। रिश्वतखोरी का सबसे ज्यादा असर उस आम आदमी पर पड़ता है, जो सरकारी दफ्तरों की प्रक्रिया और नियम-कायदों में उलझा रहता है। फाइल आगे बढ़ाने, प्रमाणपत्र बनवाने, जांच कराने, अनुमति लेने या किसी आवेदन का निस्तारण कराने के लिए उसे कभी सीधे तो कभी इशारों में ‘खर्चा-पानी’ का रास्ता दिखाए जाने की शिकायतें मिलती हैं। विडंबना यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून और निगरानी तंत्र मौजूद होने के बावजूद रिश्वत लेने वालों में कार्रवाई का डर पूरी तरह दिखाई नहीं देता। कहीं बिचौलियों के जरिए सौदेबाजी होने के आरोप लगते हैं तो कहीं कार्यालय के बाहर सक्रिय कथित दलाल व्यवस्था को अपनी गिरफ्त में लिए रहते हैं।
हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि हर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को भ्रष्ट मानने के बजाय शिकायत और प्रमाण के आधार पर कार्रवाई हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तभी प्रभावी होगी, जब शिकायतकर्ता को सुरक्षित माहौल मिले, शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने पर बिना किसी दबाव के कठोर कार्रवाई की जाए। उत्तराखंड को पर्यटन और निवेश के साथ-साथ ईमानदार प्रशासन की पहचान भी बनानी होगी। सरकारें योजनाएं और अभियान चला सकती हैं, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब सरकारी दफ्तर में बैठे व्यक्ति को यह भरोसा नहीं, बल्कि डर होगा कि रिश्वत मांगने पर उसकी नौकरी, प्रतिष्ठा और कानूनी भविष्य दांव पर लग सकता है। सवाल अब सिर्फ रिश्वत लेने वाले कर्मचारी का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो किसी फाइल को बिना ‘नजराने’ के आगे बढ़ने से रोकती है। अगर सरकारी काम की कीमत वेतन से नहीं, रिश्वत से तय होने लगे तो फिर सुशासन के दावे आखिर किसके लिए हैं?