क्या शहीदों के सपनों का बन पाया उत्तराखंड?
देहरादून(संवाददाता)। कल 15 अगस्त है सुबह होते ही उत्तराखंड की वादियों से लेकर मैदानों तक तिरंगा पूरी शान से लहराएगा। स्कूलों में राष्ट्रगान गूंजेगा, सरकारी कार्यालयों में ध्वजारोहण होगा, मिठाइयां बांटी जाएंगी और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीरों को नमन किया जाएगा। यह गर्व का दिन है, उत्सव का दिन है और उन बलिदानों को याद करने का दिन है जिनकी बदौलत हम आज स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं लेकिन इसी तिरंगे के नीचे उत्तराखंड को कुछ देर अपने आप से भी बात करनी चाहिए। क्योंकि यह वही धरती है जहां अलग राज्य की मांग केवल नक्शे पर एक नई सीमा खींचने के लिए नहीं उठी थी। इसके पीछे एक उम्मीद थी पहाड़ के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचेगा, नौजवान को अपने प्रदेश में भविष्य मिलेगा, बीमार को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और आम आदमी की आवाज सत्ता के दरवाजे तक पहुंचेगी।
उत्तराखंड बना,सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, योजनाएं आईं, सड़कें बनीं, पुल बने, सुरंगें बनीं और शहरों का चेहरा भी बदला, प्रदेश ने कई क्षेत्रों में लंबी यात्रा तय की है और इस उपलब्धि को नकारना भी न्याय नहीं होगा। लेकिन आजादी के इस पर्व पर एक सवाल पूछना अपराध नहीं होना चाहिए क्या हम उस उत्तराखंड तक पहुंच पाए हैं, जिसकी उम्मीद लेकर एक पूरी पीढ़ी सड़कों पर उतरी थी? आज भी पहाड़ का कोई नौजवान रोजगार के लिए बैग उठाकर घर से निकलता है तो पीछे दरवाजे पर खड़ी मां यही सोचती है कि बेटा अगली बार कब लौटेगा। दूरस्थ गांव में किसी की तबीयत अचानक बिगड़ जाए तो परिवार की पहली चिंता बीमारी से पहले यह होती है कि मरीज को समय रहते अस्पताल कैसे पहुंचाया जाए। कहीं बारिश की एक रात किसी परिवार की वर्षों की मेहनत बहा ले जाती है, कहीं सड़क बंद होने से पूरा इलाका दुनिया से कट जाता है। कहीं सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या घट रही है तो कहीं गांव में बुजुर्ग उस घर की चौखट संभाले बैठे हैं जिसे बनाने में उन्होंने पूरी जिंदगी लगा दी। क्या यही सवाल उत्तराखंड आंदोलन की उस पीढ़ी के मन में नहीं उठते होंगे जिसने बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष किया था?
आज राजनीति में उपलब्धियों के अपने आंकड़े हैं और विपक्ष के अपने आरोप। सरकार अपनी योजनाएं गिनाती है, विपक्ष कमियां गिनाता है। लेकिन इन दोनों के बीच एक तीसरा उत्तराखंड भी है आम आदमी का उत्तराखंड। उस आदमी को भाषण से ज्यादा अपने बच्चे की नौकरी की चिंता है। उसे घोषणा से ज्यादा गांव के अस्पताल में डॉक्टर चाहिए। उसे बड़ी-बड़ी योजनाओं से शिकायत नहीं, लेकिन वह चाहता है कि उसके हिस्से की सड़क मजबूत बने, सरकारी कार्यालय में उसकी बात सुनी जाए और उसके अधिकार के लिए उसे महीनों चक्कर न काटने पड़ें। 15 अगस्त केवल अंग्रेजों की गुलामी से मिली आजादी को याद करने का पर्व नहीं, बल्कि यह स्वयं से पूछने का अवसर भी है कि जिस लोकतंत्र के लिए इतनी कुर्बानियां दी गईं, उसका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक कितना पहुंचा? उत्तराखंड के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
राज्य छोटा है, संसाधन सीमित हैं और भौगोलिक चुनौतियां कठिन हैं। इसके बावजूद उत्तराखंड के पास मेहनती युवा हैं, प्राकृतिक संपदा है, पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और सबसे बड़ी ताकत यहां के लोगों का अपने प्रदेश से गहरा लगाव है। जरूरत केवल इस ताकत को ऐसा भविष्य देने की है कि किसी नौजवान को मजबूरी में यह न कहना पड़े “यहां मेरा भविष्य नहीं है।” आजादी का वास्तविक अर्थ केवल तिरंगा फहराना नहीं है। असली आजादी उस दिन और मजबूत होगी जब पहाड़ का नौजवान रोजगार के लिए मजबूर होकर अपना घर न छोड़े, गरीब का बच्चा पैसे के अभाव में अच्छी शिक्षा से वंचित न रहे और किसी बुजुर्ग को इलाज के लिए व्यवस्था के सामने बेबस न होना पड़े। कल जब मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी, मंत्री से लेकर अधिकारी और गांव के प्रधान तक तिरंगे को सलामी दें, तो उस तिरंगे के सामने एक संकल्प उत्तराखंड के लिए भी होना चाहिए कुर्सी को सत्ता नहीं, जिम्मेदारी माना जाएगा। क्योंकि सरकारें पांच साल के लिए आती हैं, अधिकारी कुछ वर्षों के लिए किसी जिले या विभाग में बैठते हैं, लेकिन उनके फैसलों का असर किसी परिवार की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है।
आवाम का यह सवाल किसी सरकार के विरोध में नहीं और किसी राजनीतिक दल के समर्थन में भी नहीं है। यह सवाल उस उत्तराखंड के भविष्य के लिए है जिसके निर्माण में संघर्ष, आंसू और बलिदान जुड़े हैं। कल तिरंगा जरूर फहराइए। पूरे गर्व से फहराइए। भारत माता की जय भी पूरे जोश से बोलिए लेकिन तिरंगे को सलामी देते समय एक पल उन आंखों को भी याद कीजिए जिन्होंने बेहतर उत्तराखंड का सपना देखा था। उत्तराखण्ड के अन्दर एक बहस चल रही है कि आम जनमानस सरकार से यह पूछे कि “क्या उसने उनके सपनों का उत्तराखंड बना दिया है, या अभी बहुत कुछ करना बाकी है?” यदि उत्तर भीतर से आए कि अभी बहुत कुछ बाकी है, तो शायद वही उत्तर इस स्वतंत्रता दिवस का सबसे सच्चा संकल्प होगा। क्योंकि उत्तराखंड हमें विरासत में सिर्फ रहने के लिए नहीं मिला इसे आने वाली पीढिय़ों के लिए बेहतर बनाकर छोडऩे की जिम्मेदारी भी हमारी है।