उत्तराखण्ड की सियासत में भ्रष्टाचार का बम!

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चुनाव से पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ दहाड़ती कांग्रेस
चुनावी रण से पहले बेनामी सम्पत्ति पर श्संग्राम्य
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के लिए मुख्यमंत्री ने पांच साल से मोर्चा संभाल रखा है और उन्होंने दो टूक अल्टीमेटम दे रखा है कि अगर राज्य में कोई भी भ्रष्टाचार करने का दुसाहस करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल में लाई जायेगी। वहीं राज्य के अन्दर फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी महकमों में नौकरी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अधिवक्ता विकेश नेगी ने उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक आवाज बुलंद कर रखी है और उनका दो टूक कहना है कि फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी करने वालों को मुख्यमंत्री अपनी रडार पर लें और फर्जी जाति प्रमाण पत्रों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाकर उस खेल को बेनकाब करें जो कुछ अधिकारियों ने नाटकीय ढंग से खेलकर यह प्रमाण पत्र बनाये हैं। विकेश नेगी का खुला आरोप है कि जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी करना एक बडा भ्रष्टाचार है और इस भ्रष्टाचार के खिलाफ वह अपनी लडाई लड़ते रहेंगे और उन्हें आशा है कि शायद मुख्यमंत्री इन फर्जी जाति प्रमाण पत्रों का सारा राज बेनकाब करके उन्हें नौकरी से बाहर का रास्ता दिखायेंगे जो सरकार को धोखा देकर युवाओं के हक पर एक बडी चोट कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव की आहट से पहले उत्तराखंड की राजनीति में अब भ्रष्टाचार और नेताओं की संपत्ति बड़ा सियासी हथियार बनने जा रहा है। कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने के संकेत दे दिए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत ने सीधे भाजपा नेताओं की संपत्तियों पर सवाल खड़े करते हुए प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाए हैं। हालांकि हरक सिंह रावत तथा अन्य संगठनों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित नेताओं का पक्ष भी इन आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हरक सिंह रावत ने सवाल उठाया है कि जिन नेताओं का कोई बड़ा व्यवसाय अथवा ऐसी घोषित आय दिखाई नहीं देती, उनके पास कथित रूप से इतनी बड़ी संपत्ति आखिर आई कहां से? उनका कहना है कि जांच एजेंसियों को राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर ऐसे प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यही सवाल आने वाले दिनों में कांग्रेस के चुनावी अभियान का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
हरक सिंह रावत ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल श्निशंक्य के श्लेखक गांव्य का जिक्र करते हुए ईडी को वहां जाकर इसकी वित्तीय पृष्ठभूमि की जांच करने की चुनौती दी है। इसके साथ ही उन्होंने कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी को लेकर भी तीखा हमला बोला और उनकी संपत्ति से जुड़े आरोपों की जांच की मांग उठाई। इन बयानों के बाद उत्तराखंड की राजनीति में सवाल सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह जाता, बल्कि यह भी है कि क्या सार्वजनिक जीवन में बैठे नेताओं की संपत्तियों और आय के स्रोतों को लेकर कोई ऐसी पारदर्शी व्यवस्था सामने आएगी जिससे राजनीतिक आरोपों का सच जनता के सामने आ सके? प्रदेश में बेनामी संपत्तियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे समय-समय पर होते रहे हैं। सरकार भ्रष्टाचार पर श्जीरो टॉलरेंस्य की नीति की बात करती रही है, लेकिन विपक्ष अब पूछ रहा है कि यदि बड़े नेताओं या प्रभावशाली लोगों के खिलाफ शिकायतें और आरोप सामने आते हैं तो उन पर जांच की रफ्तार और नतीजे जनता के सामने कितनी स्पष्टता से रखे जाते हैं? केवल आरोप लगना किसी को दोषी साबित नहीं करता, लेकिन गंभीर आरोपों का निष्पक्ष और समयबद्ध परीक्षण होना भी लोकतांत्रिक जवाबदेही का अहम हिस्सा है। पिछले काफी समय से कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, हरक सिंह रावत और तिलक राज बेहड़ राज्य सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दों पर उनकी घेराबंदी करने के लिए सड़क से लेकर मीडिया के सामने खूब दहाड़ रहे हैं।
मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से गर्म हो सकता है क्योंकि जन संघर्ष मोर्चा भी लंबे समय से प्रदेश के कुछ मंत्रियों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार और संपत्ति संबंधी मामलों को उठाता रहा है। संगठन की ओर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से आरोपों की जांच कराने तथा दोष सिद्ध होने की स्थिति में संबंधित लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग होती रही है। विपक्ष अब इसी मुद्दे को आधार बनाकर सरकार से पूछ सकता है कि जिन मामलों में दस्तावेजों और शिकायतों के आधार पर सवाल उठाए गए, उनमें अंतिम परिणाम क्या निकला? यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के सामने भी बड़ी राजनीतिक कसौटी है। सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार सख्त संदेश देती रही है। ऐसे में विपक्ष यदि मंत्रियों और भाजपा नेताओं की संपत्तियों को चुनावी मुद्दा बनाता है तो सरकार को केवल राजनीतिक पलटवार से नहीं, बल्कि तथ्यों और कार्रवाई के रिकॉर्ड के साथ जवाब देना पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल जांच एजेंसियों की निष्पक्षता को लेकर खड़ा किया जा रहा है। यदि किसी विपक्षी नेता के खिलाफ शिकायत या ठोस साक्ष्य मिलने पर जांच हो सकती है तो सत्ता पक्ष से जुड़े किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप सामने आने पर भी कानून का पैमाना समान दिखाई देना चाहिए। जांच में आरोप गलत निकलें तो संबंधित नेता को सार्वजनिक रूप से राहत मिले और यदि कोई गड़बड़ी सामने आए तो पद और राजनीतिक हैसियत देखे बिना कार्रवाई होकृयही व्यवस्था जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता मजबूत कर सकती है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार, कथित बेनामी संपत्तियों और नेताओं की आय बनाम संपत्ति को संगठित तरीके से चुनावी मुद्दा बनाती है तो भाजपा के सामने इसका जवाब देना बड़ी चुनौती हो सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए भी केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगाय उसे अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण और दस्तावेज जनता के सामने रखने होंगे। अब उत्तराखंड की सियासत में असली लड़ाई इस सवाल पर टिक सकती हैकृआरोप किसी भी दल के नेता पर हों, क्या जांच का तराजू सबके लिए बराबर होगा? और यदि किसी नेता की संपत्ति उसकी वैध आय से मेल नहीं खाती, तो उसकी निष्पक्ष जांच से आखिर परहेज क्यों होना चाहिए? चुनाव से पहले उठी यह चिंगारी आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकती है।

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