आखिर कौन तोडे़गा नशा माफियाओं की कमर?
पहाड़ से लेकर मैदान तक ‘मौत की पुडिया’ का कहर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही युवाओं की नसों में जहर घोल रहे नशा माफियाओं का एक दशक बाद भी साम्राज्य खत्म नहीं हो पाया है जिससे उन युवाओं के परिवारों में चिंता की लकीरें हैं कि उनके लाडले इस सफेद जहर से बच पायेंगे या फिर वह उसके गुलाम बनकर रह जायेंगे? लम्बे दशक से देवभूमि नशा माफियाओं के शिकंजे में नजर आ रही है और जिस तरह से पहाड़ से लेकर मैदान के कुछ जनपदों में मौत की पुडिया युवा पीढ़ी को अपनी जकड़ में लेकर उन्हें अपना गुलाम बना रही है वह सरकार और सिस्टम के लिए हमेशा एक चिंता का विषय रहा है और इस नेटवर्क को तोडने के लिए सरकार ने बडे-बडे ऑपरेशन चलाये लेकिन जवानी पर सफेद मौत का हमला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हैरानी वाली बात है कि मौत बेचने वालों का नेटवर्क इतना अभेद कैसे हो रखा है कि वह जवानी को मौत की दहलीज पर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। उत्तराखण्ड के अन्दर हमेशा एक ही सवाल पनपता आ रहा है कि देवभूमि में मौत का साम्राज्य स्थापित करने वालों को आखिर कौन अपनी शरण दिये हुये है जिसके चलते नशे का काला धंधा बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा है?
उत्तराखंड की पहचान कभी देवभूमि, वीरभूमि और संस्कारों की धरती के रूप में होती थी। लेकिन आज इसी देवभूमि के माथे पर एक ऐसा कलंक लग चुका है, जो किसी प्राकृतिक आपदा से भी अधिक भयावह दिखाई दे रहा है। यह कलंक है स्मैक और नशे के संगठित कारोबार का। सबसे दर्दनाक बात यह है कि यह कारोबार अब किसी एक शहर या जिले तक सीमित नहीं रहा। देहरादून से लेकर हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर से लेकर नैनीताल और पहाड़ के शांत कस्बों तक, मौत की यह पुड़िया खुलेआम उत्तराखंड की जवानी को निगल रही है। आज शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसने नशे की इस महामारी का दर्द सीधे या परोक्ष रूप से महसूस न किया हो। किसी का बेटा नशा मुक्ति केंद्र में है, किसी ने अपनी जमीन बेचकर इलाज कराया, तो किसी मां ने अपने जवान बेटे की अर्थी को कंधा दिया। यह केवल अपराध नहीं है, यह उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ी की सुनियोजित बर्बादी है। जिस उम्र में युवाओं के हाथों में किताबें, कंप्यूटर और रोजगार के सपने होने चाहिए थे, उस उम्र में कई नौजवान स्मैक की पुड़िया और इंजेक्शन के पीछे अपनी जिंदगी गिरवी रख रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह जहर उत्तराखंड तक पहुंच कैसे रहा है? सीमाएं हैं, चेकपोस्ट हैं, पुलिस है, खुफिया एजेंसियां हैं, फिर भी नशे का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है। समय-समय पर पुलिस की कार्रवाई में तस्कर गिरफ्तार होते हैं, मादक पदार्थ बरामद होते हैं और कई सराहनीय अभियान भी चलाए जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद यदि हर गली, हर कस्बे और हर जिले में स्मैक आसानी से उपलब्ध है, तो यह संकेत देता है कि इस चुनौती से निपटने के लिए और अधिक व्यापक, समन्वित तथा निर्णायक रणनीति की आवश्यकता है। केवल छोटे स्तर के तस्करों तक कार्रवाई सीमित रहने से समस्या की जड़ तक पहुंचना संभव नहीं होगा। यह भी एक कड़वा सच है कि नशे का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकट का रूप ले चुका है। नशे की लत में फंसा युवा पहले घर से पैसे चुराता है, फिर परिवार से दूर होता है और कई मामलों में अपराध की राह पर भी पहुंच जाता है। नतीजा यह होता है कि एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार बिखर जाता है। किसी मां की गोद उजड़ती है, किसी बहन की राखी सूनी होती है और किसी पिता की उम्रभर की कमाई बेटे को बचाने की कोशिश में खत्म हो जाती है।
इस लड़ाई में केवल सरकार या पुलिस को कटघरे में खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक नारेबाजी तक सीमित न रखे, बल्कि इसे विधानसभा से लेकर गांव की चौपाल तक सबसे बड़ा जनमुद्दा बनाए। समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। माता-पिता को अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा, स्कूलों और कॉलेजों को जागरूकता बढ़ानी होगी और युवाओं के लिए खेल, रोजगार तथा सकारात्मक अवसरों का विस्तार करना होगा। यदि समाज चुप रहा, तो स्मैक माफिया की जीत आसान होती जाएगी। अब समय केवल प्रेस नोट जारी करने या नशा मुक्ति दिवस मनाने का नहीं है। अब जरूरत है कि इस पूरे नेटवर्क की आर्थिक, आपराधिक और अंतरराज्यीय कड़ियों तक पहुंचकर निर्णायक कार्रवाई की जाए। जो लोग इस कारोबार से युवाओं का भविष्य बेच रहे हैं, उन्हें कानून के दायरे में लाना ही इस लड़ाई की असली सफलता होगी।
देवभूमि को बचाने के लिए अब केवल भाषण नहीं, परिणाम चाहिए। क्योंकि अगर आज उत्तराखंड की जवानी नहीं बची, तो कल न मंदिरों की घंटियां उम्मीद जगाएंगी, न पहाड़ों की वादियां भविष्य का गीत गाएंगी। इतिहास तब यही लिखेगा कि जब देवभूमि का भविष्य स्मैक की आग में जल रहा था, तब व्यवस्था देखती रही और मौत का कारोबार बढ़ता रहा। यह लड़ाई किसी सरकार, किसी विपक्ष या किसी एक विभाग की नहीं है। यह लड़ाई उत्तराखंड की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। और इस लड़ाई में देर की कीमत आने वाली पीढ़ियां अपनी जिंदगी देकर चुकाएंगी।