यूकेडी में सियासी संग्राम!

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क्या बिखर जायेगा चुनावी सपना?
चुनावी रण से पहले यूकेडी में सियासी विस्फोट
देहरादून। उत्तराखण्ड बनने के बाद क्षेत्रीय दल यूकेडी ने भाजपा और कांग्रेस के समक्ष खडे होने का खूब जोर लगाया लेकिन वह इन दोनो राजनीतिक पार्टियों का विकल्प नहीं बन पायी थी। उक्रांद को राज्य बनने के बाद जनता ने उस पर कुछ भरोसा किया भी था लेकिन उनके चंद नेताओं ने कुर्सी की खातिर अपने दल को हाशिये पर लाने का जो दौर शुरू किया था वह अंधकारमय होता चला गया था और उक्रांद का वजूद राज्य के अन्दर हाशिये पर चला गया था। एक दशक तक उक्रांद राज्य के अन्दर आवाम का दिल जीतने में सफल नहीं हो पाया लेकिन अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद उसने सडकों पर अंकिता को न्याय दिलाने के लिए जो अलख जगाई थी उससे गढवाल के काफी जनपदों में उक्रांद का वजूद बढने लगा था। 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर उक्रांद के कुछ नेता सत्ता में आने का दम भर रहे थे लेकिन अचानक एक बार फिर उक्रांद ने एक सियासी संग्राम शुरू हो गया और जिस तरह से दल के केन्द्रीय उपाध्यक्ष को उनके पदों से अवमुक्त कर दिया गया उससे यूकेडी में सियासी विस्फोट होता हुआ नजर आ रहा है। अब राज्य के अन्दर सवाल खडे हो रहे हैं कि चुनाव में जीत का दम भरने वाली उक्रांद कहीं आपसी टकराव में चुनाव से पहले ही बिखर न जाये?
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल के रूप में अपनी अलग पहचान रखने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर खुद को मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। पार्टी लगातार दावा कर रही है कि इस बार वह प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाएगी। अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर लगातार मुखर रहने के कारण यूकेडी ने सरकार को कई बार घेरा है और पहाड़ के कई इलाकों में उसकी सक्रियता भी बढ़ती दिखाई दी है। लेकिन चुनावी तैयारी के बीच पार्टी के भीतर उठे विवाद ने पूरे राजनीतिक समीकरण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्रीय उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी को पद से मुक्त किए जाने के फैसले ने साफ संकेत दिया है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे महज अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि नेतृत्व और संगठन के भीतर बढ़ते मतभेदों के रूप में देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो पार्टी खुद को प्रदेश की राजनीति का मजबूत विकल्प बताने का दावा कर रही है, क्या वह पहले अपने ही घर की दरारें भर पाएगी? चुनाव से ठीक पहले संगठन में उठी खींचतान कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित कर सकती है और जनता के बीच भी गलत संदेश दे सकती है। उत्तराखंड क्रांति दल का इतिहास भी गुटबाजी, टूट और नेतृत्व विवादों से अछूता नहीं रहा है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम पुराने जख्मों को फिर ताजा करता नजर आ रहा है। हालांकि पार्टी के समर्थकों का कहना है कि यह पूरी तरह संगठन का आंतरिक मामला है और चुनाव से पहले सभी मतभेद खत्म कर लिए जाएंगे। उनका मानना है कि यूकेडी क्षेत्रीय मुद्दों और जनभावनाओं के दम पर मजबूती से चुनाव मैदान में उतरेगी। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह विवाद यहीं थमेगा या आने वाले दिनों में और नेताओं की नाराजगी भी सामने आएगी।
अब निगाहें यूकेडी नेतृत्व पर हैं। यदि पार्टी समय रहते संगठन को एकजुट कर पाती है तो वह क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर सकती है। लेकिन यदि अंदरूनी संघर्ष और गहराया, तो 2027 में सत्ता परिवर्तन के दावे करने वाली पार्टी को सबसे पहले अपने ही संगठन को संभालने की चुनौती से जूझना पड़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही हैकृक्या यूकेडी चुनावी रण में विपक्ष को चुनौती देने से पहले अपने ही घर की सियासी आग बुझा पाएगी, या फिर यही अंदरूनी घमासान 2027 के सपनों पर सबसे बड़ा ग्रहण साबित होगा?

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