विकास की उड़ान से बनाई नई पहचान
सत्ता नहीं विकास की राजनीति करते सीएम
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति हमेशा से आसान नहीं रही। यहां सत्ता के समीकरण पलभर में बदलते रहे हैं, नेतृत्व बदलता रहा है और जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ती रही हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में जब जुलाई 2021 में पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, तब उनके सामने केवल सरकार चलाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि जनता का विश्वास जीतने और स्वयं को एक प्रभावी नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की भी बड़ी परीक्षा थी। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव केवल नारों से नहीं, बल्कि फैसलों और उनके परिणामों से जीते जाते हैं। शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री धामी ने अपने कार्यकाल में बार-बार विकास, सुशासन और त्वरित निर्णयों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाने का प्रयास किया। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने सत्ता को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राज्य को नई दिशा देने के अवसर के रूप में देखा।
इन पांच वर्षों में उत्तराखंड ने कई ऐसे निर्णय देखे, जिनकी चर्चा केवल राज्य तक सीमित नहीं रही। समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम, सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, निवेश को बढ़ावा देने की नीति, धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के विस्तार की योजनाएं, चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं में सुधार, सड़क और स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार तथा डिजिटल प्रशासन जैसे विषय लगातार सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहे। मुख्यमंत्री धामी ने कई मंचों से यह संदेश देने की कोशिश की कि उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रदेश नहीं, बल्कि निवेश, रोजगार और आधुनिक विकास का भी केंद्र बन सकता है। यही सोच ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट जैसे आयोजनों में भी दिखाई दी, जहां राज्य में निवेश आकर्षित करने का प्रयास किया गया। सरकार का दावा रहा कि इससे उद्योग, पर्यटन और स्थानीय रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। धामी सरकार के कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण पहलू कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सख्ती को भी माना जाता है। विभिन्न मामलों में त्वरित कार्रवाई, सरकारी तंत्र में जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख जैसे विषय लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने। समर्थकों ने इसे निर्णायक नेतृत्व की पहचान बताया, जबकि विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार से सवाल भी किए। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं और अंतिम निर्णय जनता करती है।
राजनीति में सबसे कठिन काम केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों पर लगातार खरा उतरना होता है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है, जहां भौगोलिक परिस्थितियां विकास कार्यों की गति को प्रभावित करती हैं। दूरस्थ गांवों तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना किसी भी सरकार के लिए आसान कार्य नहीं होता। ऐसे में विकास केवल घोषणा नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास की मांग करता है। इन वर्षों में सरकार ने पर्यटन को आर्थिक विकास का मजबूत आधार बनाने पर भी विशेष जोर दिया। चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं में सुधार, धार्मिक पर्यटन के साथ एडवेंचर और इको-टूरिज्म को बढ़ावा, होमस्टे नीति, स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की पहल तथा महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन जैसे कदम इसी सोच का हिस्सा रहे। युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना भी सरकार की प्राथमिकताओं में लगातार शामिल रहा। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, कौशल विकास, स्टार्टअप और स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से युवाओं को अवसर देने के प्रयास किए गए। हालांकि रोजगार का मुद्दा आज भी राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है और आने वाले वर्षों में यह किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा रहेगा।
धामी सरकार की कार्यशैली का एक और पहलू यह रहा कि मुख्यमंत्री स्वयं लगातार जिलों का दौरा करते रहे, विकास योजनाओं की समीक्षा करते रहे और अधिकारियों को समयबद्ध कार्यों के निर्देश देते रहे। आपदा प्रबंधन, मानसून की तैयारियां, सड़क परियोजनाएं, अस्पतालों का निरीक्षण और जनसंवाद जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशासनिक सक्रियता का संदेश देने की कोशिश भी लगातार दिखाई दी। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो पिछले पांच वर्ष धामी के लिए केवल सरकार चलाने का समय नहीं थे, बल्कि स्वयं को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने का दौर भी थे, जो तेज निर्णय लेने, विकास को प्राथमिकता देने और जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने की छवि बनाना चाहते हैं। यही कारण है कि उनके समर्थक अक्सर कहते हैं कि धामी ने अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार विकास को बनाया है। बेशक, किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उसके दावों से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से होता है। विकास की वास्तविक तस्वीर सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, निवेश और आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से तय होती है। आने वाले समय में जनता यही देखेगी कि पिछले वर्षों में शुरू की गई योजनाएं कितनी सफल रहीं और उनका लाभ कितनी व्यापकता से लोगों तक पहुंचा। इतिहास हमेशा उन सरकारों को याद रखता है, जिन्होंने केवल राजनीतिक बहस नहीं की, बल्कि अपने कार्यों से स्थायी पहचान बनाई। उत्तराखंड की जनता भी अंततः उसी कसौटी पर हर सरकार को परखती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक यात्रा का अंतिम मूल्यांकन भी इसी आधार पर होगा कि विकास की जिस राह को उन्होंने अपनी प्राथमिकता बनाया, वह राज्य को कितनी दूर तक आगे ले जा सकी।