नारायण के बाद धामी ने दिया स्थिर नेतृत्व

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एक दशक से राजनीति में अस्थिरता रही पहचान
तिवारी और पुष्कर ने आवाम का दिल जीत कर बनाई अलग पहचान
देहरादून। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को जब सरकार चलाने का मौका मिला था तो पार्टी के ही कुछ दिग्गज नेता अकसर उनके खिलाफ विद्रोह का डंका बजाते थे लेकिन राजनीति के महापंडित रहे नारायण दत्त तिवारी ने अपना शानदार पांच साल का कार्यकाल अपनों के विरोध के बावजूद पूरा किया था और उन्हें उत्तराखण्ड का विकास पुरूष माना गया। अब राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नारायण दत्त तिवारी से ज्यादा समय का अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है लेकिन यह भी सच है कि पांच साल में मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के ही काफी नेता पर्दे के पीछे रहकर साजिशों का खेल खेलते आ रहे हैं और इस साजिश का ही परिणाम था कि खटीमा से धामी को विधानसभा चुनाव हरवा दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लाडले को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया और उन्होंने अपना शानदार कार्यकाल अपनों के विरोध के बावजूद पूरा कर उन्हें एक बडा आइना दिखा दिया है जिससे उन्हें राज्य का धुरंधर मुख्यमंत्री भी मान लिया गया।
उत्तराखण्ड की राजनीति का इतिहास यदि किसी एक शब्द में समेटना हो तो वह शब्द है अस्थिरता। राज्य गठन के बाद सरकारें बनीं, मुख्यमंत्री बदले, नेतृत्व परिवर्तन हुए और सत्ता के गलियारों में राजनीतिक समीकरण हर कुछ समय बाद बदलते रहे। कई मुख्यमंत्री आए, लेकिन बहुत कम ऐसे रहे जिन्हें जनता के लिए अपनी सोच और योजनाओं को जमीन पर उतारने का पर्याप्त समय मिला। इसी इतिहास में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का नाम एक अलग स्थान रखता है। उनके कार्यकाल में भी राजनीतिक मतभेद और चुनौतियां थीं, लेकिन प्रशासनिक अनुभव, संगठनात्मक क्षमता और विकास पर केंद्रित दृष्टिकोण के कारण उन्होंने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। औद्योगिक विकास, निवेश, रोजगार और आधारभूत ढांचे पर उनका जोर आज भी उनकी राजनीतिक पहचान का प्रमुख आधार माना जाता है। यही कारण है कि उत्तराखण्ड की राजनीति में उन्हें विकास पुरुष के रूप में याद किया जाता है।
वर्षों बाद उत्तराखण्ड की राजनीति में एक और ऐसा चेहरा सामने आया, जिसने कम उम्र में मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद अपने नेतृत्व को स्थापित किया। पुष्कर सिंह धामी जब मुख्यमंत्री बने, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वे राज्य के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्रियों में शामिल हो जाएंगे। मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें विधानसभा चुनाव का सामना करना पड़ा। खटीमा सीट से हार के बाद राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया। कई तरह के कयास लगाए गए कि अब नेतृत्व बदल सकता है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विश्वास ने राजनीतिक तस्वीर बदल दी और धामी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया।
यहीं से धामी की वास्तविक राजनीतिक परीक्षा शुरू हुई। सत्ता में वापसी के बाद उन्होंने कई ऐसे निर्णय लिए जिन्होंने उत्तराखण्ड की राजनीति की दिशा बदलने की कोशिश की। समान नागरिक संहिता (यूसीसी), नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, दंगा विरोधी कानून, सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, निवेश को बढ़ावा, महिलाओं और युवाओं के लिए योजनाएं, चारधाम यात्रा प्रबंधन तथा अवैध अतिक्रमण, अवैध मदरसों और अवैध मजारों के विरुद्ध कार्रवाई जैसे फैसलों ने उन्हें समर्थकों के बीच एक निर्णायक मुख्यमंत्री की छवि दी। इन कदमों पर राजनीतिक मतभेद भी रहे, लेकिन यह भी सच है कि इन निर्णयों ने धामी सरकार को लगातार चर्चा के केंद्र में बनाए रखा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखण्ड में किसी भी मुख्यमंत्री के लिए सबसे कठिन चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखना भी होती है। धामी के कार्यकाल में समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें और अंदरूनी असहमति की चर्चाएं भी सामने आती रहीं। इसके बावजूद उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा कर यह संदेश दिया कि राजनीतिक नेतृत्व केवल चर्चाओं से नहीं, बल्कि संगठन के विश्वास, प्रशासनिक निर्णयों और जनता के बीच बनी स्वीकार्यता से मजबूत होता है।
आज जब उत्तराखण्ड अपने राजनीतिक सफर के पच्चीसवें वर्ष में आगे बढ़ रहा है, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या राज्य अब नेतृत्व परिवर्तन की पुरानी राजनीति से आगे निकल रहा है? क्या स्थिर नेतृत्व अब अपवाद नहीं, बल्कि नई परंपरा बन सकता है? इन सवालों का अंतिम जवाब भविष्य देगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि लंबे समय तक सरकार चलाने वाले नेताओं की सूची में अब पुष्कर सिंह धामी का नाम भी प्रमुखता से दर्ज हो चुका है। नारायण दत्त तिवारी और पुष्कर सिंह धामी दो अलग-अलग दौर के मुख्यमंत्री हैं। परिस्थितियां अलग थीं, चुनौतियां अलग थीं और राजनीति का स्वरूप भी अलग था। फिर भी दोनों के राजनीतिक सफर में एक समानता दिखाई देती हैकृदोनों ने कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व किया और उत्तराखण्ड की राजनीति में स्थिर शासन का उदाहरण प्रस्तुत किया। इतिहास किसी भी नेता का अंतिम मूल्यांकन समय के साथ करता है, लेकिन वर्तमान की राजनीति में इतना कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उत्तराखण्ड ने एक बार फिर ऐसा दौर देखा है, जहां राजनीतिक स्थिरता ने विकास, निर्णय क्षमता और नेतृत्व की चर्चा को नई दिशा दी है।

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