सीएम साहबः फोन नहीं उठाते अफसर!

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मोबाइल में नम्बर फीड तो ही उठायेंगे कॉल?
कुछ पॉवरफुल अफसर अपने आपको समझते हैं ‘सम्राट’
देहरादून। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेह प्रशासन का दावा करते हैं। हर मंच से अधिकारियों को जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहने और समयबद्ध समाधान के निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन सरकार की मंशा और जमीनी हकीकत के बीच का फासला आज भी कई विभागों में साफ दिखाई देता है। हैरानी वाली बात है कि उत्तराखण्ड में काफी छोटे से लेकर बडे अफसर तक आम इंसान का फोन उठाना तो दूर मीडिया के काफी लोगों के फोन भी उठाने से वह गुरेज करते हैं और जिनके नम्बर उनके मोबाइल नम्बर में फीड हैं उन्हीं के फोन उठाना वह पसंद करते हैं जिससे सवाल खडा हो रहा है कि अफसरों के इस रूतबे के पीछे ऐसी कौन सी कहानी छुपी हुई है कि वह अपने आपको सम्राट समझते हैं?
प्रदेश के कई विभागों में ऐसे अधिकारी तैनात हैं, जिन तक पहुंचना आम आदमी तो दूर, पत्रकारों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकारी वेबसाइटों, विभागीय पत्रों और कार्यालयों में मोबाइल नंबर तो बड़े गर्व से लिखे जाते हैं, लेकिन जब उन नंबरों पर फोन किया जाता है तो या तो घंटी बजती रहती है या फिर कॉल रिसीव करने की जहमत नहीं उठाई जाती। जनता अपनी समस्या लेकर फोन करती है, शिकायत बताना चाहती है, किसी जरूरी मामले की जानकारी देना चाहती है, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं मिलता। दूसरी ओर पत्रकार जब किसी खबर के संबंध में विभाग का पक्ष लेने या तथ्य जानने के लिए फोन करते हैं तो कई अधिकारी फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझते। नतीजा यह होता है कि कई बार खबरें बिना विभागीय प्रतिक्रिया के प्रकाशित होती हैं और बाद में वही अधिकारी शिकायत करते नजर आते हैं कि उनका पक्ष नहीं लिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी मोबाइल नंबर जारी करने का उद्देश्य क्या है? यदि अधिकारी फोन उठाने के लिए तैयार नहीं हैं तो फिर जनता और मीडिया के लिए जारी किए गए संपर्क नंबर केवल दिखावे के लिए हैं या फिर सरकारी रिकॉर्ड पूरा करने के लिए? विडंबना यह है कि कुछ अधिकारी फील्ड में कम और मोबाइल से दूरी बनाने में ज्यादा सक्रिय दिखाई देते हैं। जनता घंटों फोन मिलाती रहती है, पत्रकार लगातार संपर्क करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मानो किसी अलग ही दुनिया में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में जनता की समस्याओं का समाधान और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों प्रभावित होती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कई बार कहा है कि अधिकारी जनता की समस्याओं को प्राथमिकता दें और आम लोगों के प्रति जवाबदेह बनें। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार उन अधिकारियों की कार्यशैली की भी समीक्षा करेगी जो सरकारी कुर्सी पर बैठकर जनता और मीडिया दोनों से दूरी बनाए हुए हैं?
आखिर जनता के टैक्स से वेतन लेने वाले अधिकारियों की पहली जिम्मेदारी जनता की बात सुनना है या फोन की घंटी बजने देना? यदि कोई अधिकारी लगातार फोन नहीं उठाता, शिकायतों का जवाब नहीं देता और संवाद से बचता है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि जिम्मेदारी से बचने का भी संकेत है। अब जरूरत इस बात की है कि मुख्यमंत्री धामी ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय करें। क्योंकि जनता को सिर्फ आदेश और दावे नहीं, बल्कि सुनवाई और समाधान चाहिए। वरना ष्नॉट रीचेबल अफसरशाहीष् सुशासन के दावों पर सवाल खड़े करती रहेगी।

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