आखिर कब तक भ्रष्टाचार करेंगे कुछ अफसर?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री जीरो टॉलरेंस पर सरकार चला रहे हैं और उन्होंने बडे-बडे अफसरों को भी सबक सिखाया है कि अगर उन्होंने भ्रष्टाचार किया है तो इसका परिणाम उन्हें भुगतना ही है। हाल ही में नगर निगम में हुये जमीन घोटाले में मुख्यमंत्री ने जिस सख्ती के साथ एक्शन लिया है उससे भ्रष्टाचारियों में खलबली मच गई है लेकिन एक सवाल यह भी खडा हो गया है कि आखिरकार कुछ अफसर मुख्यमंत्री की सख्ती के बावजूद भी कैसे बेखौफ हो रखे हैं कि वह भ्रष्टाचार करने से नहीं डर रहे? उत्तराखण्ड के अन्दर पच्चीस सालों से आम आदमी के मन में एक ही सवाल उठता आ रहा है कि जब सरकार की मंशा भ्रष्टाचार के खिलाफ साफ है तो फिर व्यवस्था में वो कौन अफसर हैं जो भ्रष्टाचार को पंख लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं?
उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने की ओर बढ़ रहा है। इन वर्षों में प्रदेश ने विकास, पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस प्रकार की सख्त कार्रवाई देखने को मिली है, उसने आम जनता के बीच एक नया विश्वास पैदा किया है। भर्ती घोटालों पर कार्रवाई हो, नकल माफियाओं के खिलाफ अभियान हो या फिर सरकारी तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास, सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी पूरे देश में चर्चा हुई। इसके बावजूद प्रदेश का आम नागरिक आज भी एक सवाल पूछ रहा हैकृआखिर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की जड़ें अभी तक पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो पाई हैं? जनता का कहना है कि मुख्यमंत्री की नीयत और नीतियों पर किसी को संदेह नहीं है। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से साफ कहा है कि भ्रष्टाचार करने वालों के लिए उत्तराखंड में कोई जगह नहीं है। लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी कई विभागों में आम लोगों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कहीं फाइलें अटकती हैं, कहीं जांच के नाम पर देरी होती है, तो कहीं नियमों की आड़ में लोगों को महीनों तक भटकना पड़ता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब मुख्यमंत्री लगातार अधिकारियों को जवाबदेह बनाने की बात कर रहे हैं, तब आखिर व्यवस्था के भीतर ऐसे कौन लोग हैं जो सरकार की मंशा को धरातल पर पूरी तरह उतरने नहीं दे रहे? आखिर कौन हैं वे लोग जिनकी वजह से जनता का भरोसा कई बार टूटता है और सरकार की छवि पर भी सवाल खड़े होते हैं? प्रदेश के दूरस्थ गांवों से लेकर शहरों तक यह चर्चा आम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को और अधिक तेज करने की आवश्यकता है। लोगों का मानना है कि जिस प्रकार नकल माफियाओं और बड़े घोटालों पर कार्रवाई हुई, उसी प्रकार रोजमर्रा के भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों पर भी कठोर और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होते हैं तो उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो पूरे सिस्टम के लिए उदाहरण बने।
आज जरूरत इस बात की है कि मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति का प्रभाव राज्य के अंतिम व्यक्ति तक दिखाई दे। तकनीक आधारित व्यवस्था, समयबद्ध सेवाएं, पारदर्शी कार्यप्रणाली और जनता की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई ही भ्रष्टाचार पर सबसे बड़ा प्रहार साबित हो सकती है। उत्तराखंड की जनता मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठी है। लोगों का विश्वास है कि जिस दृढ़ता के साथ उन्होंने कई बड़े फैसले लिए हैं, उसी दृढ़ता से वे प्रशासनिक व्यवस्था में छिपे भ्रष्टाचार के नेटवर्क पर भी निर्णायक प्रहार करेंगे। क्योंकि विकसित उत्तराखंड का सपना तभी साकार होगा, जब ईमानदार नागरिक को अपने हक के लिए किसी सिफारिश या रिश्वत का सहारा न लेना पड़े। अब देखना यह होगा कि भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड के संकल्प को और मजबूत बनाने के लिए आने वाले समय में कौन से नए कदम उठाए जाते हैं। जनता की निगाहें सरकार पर हैं और जनता को उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई निर्णायक मोड़ तक जरूर पहुंचेगी।