चार साल से थर्रा रहा माफिया तंत्र
धुरंधर के सख्त फैसलों से आवाम गदगद
देहरादून। उत्तराखण्ड में धुरंधर राजनेता का ताज सिर पर पहनने वाले मुख्यमंत्री ने सियासत में इतनी लम्बी लकीर खींच दी है कि उसे पार पाना विपक्षी दलों के लिए टेडी खीर होता जा रहा है। मुख्यमंत्री ने चार साल में एक के बाद एक ऐतिहासिक फैसले लिये और उन्होंने अपने शासनकाल में लिये गये किसी भी फैसले को वापस लेने के लिए कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाये। मुख्यमंत्री ने चार साल में लैंड, लव, जिहाद पर बडा प्रहार किया तो उन्होंने राज्य के अन्दर अवैध मजारें और अवैध मदरसों पर सख्ती के साथ एक्शन करके संदेश दे दिया कि उनके राज में वो सबकुछ नहीं चलेगा जो पूर्व में सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के लिए चला करता था। चार साल से माफिया तंत्र पर मुख्यमंत्री का बडा प्रहार उन्हें एक बडा जख्म दे चुका है और यही कारण है कि आज माफिया तंत्र धुरंधर की कडक शैली से थरथर कांप रहा है तो वहीं राज्य की जनता मुख्यमंत्री के कडक फैसलों से बेहद गदगद है। अब राज्य में फिर धामी की गूंज उफान पर है कि 2०27 के चुनावी रण को वह नई शैली के साथ लडेंगे जिससे एक बार फिर राज्य के अन्दर कमल खिल सके?
उत्तराखंड की राजनीति में पिछले चार वर्षों के दौरान जिस तरह से शासन-प्रशासन की कार्यशैली बदली है, उसने एक नए मॉडल की चर्चा को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने जिस आक्रामक अंदाज में अवैध धंधों, संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क के खिलाफ अभियान चलाया, उसने पूरे सिस्टम में एक स्पष्ट संदेश दियाकृअब कानून का राज ही सर्वोपरि होगा। सरकार के इस कार्यकाल में अवैध खनन, भू-माफिया, नशा तस्करी और फर्जी कारोबार के खिलाफ लगातार कार्रवाई देखने को मिली। कई मामलों में बड़े स्तर पर छापेमारी की गई, तो कई आरोपियों की संपत्तियों पर कार्रवाई कर आर्थिक रूप से भी उन्हें कमजोर करने की रणनीति अपनाई गई। शासन स्तर से जिलों को साफ निर्देश दिए गए कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीमों ने जमीनी स्तर पर लगातार अभियान चलाए, जिससे कई क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगने के संकेत मिले। आम जनता के बीच भी यह धारणा मजबूत होती गई कि सरकार अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर परिणाम देने की दिशा में काम कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सख्त फैसलों और तेज कार्रवाई की यह शैली सरकार की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभरी है। यही वजह है कि 2०27 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से चर्चाएं तेज हो गई हैं। समर्थक इसे “धामी मॉडल” बताते हुए दोबारा सत्ता में वापसी का दावा कर रहे हैं, तो विपक्ष इस पर सवाल उठाकर इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में है। कुल मिलाकर, चार वर्षों में सख्ती और निर्णायक फैसलों की नीति ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है। अब सबकी नजर 2०27 पर टिक गई है, जहां यह तय होगा कि जनता इस कार्यशैली को दोबारा मौका देती है या नहीं।
