सरकार में ‘घुन अफसरों’ की चौधराहट

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कलमवीर दोस्तों की मदद से बने हैं सूरमा!
गुड गवर्नेंस की छवि में लगा रहे बदनुमा दाग?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। सरकारें गेहूं के माफिक होती हैं, जिनकी मशक्कत से राज्यों में आटे के रूप में विकास होता है। जैसे की गेहूं को खराब करने में सबसे अहम् योगदान घुन का होता है वैसे ही सरकार की छवि को खराब करने में भी घुन रूपी अफसरों का अहम् योगदान होता है और यह तर्क इतिहास में कई बार हकीकत साबित होता आया है। उत्तराखण्ड राज्य में भी घुन अफसरों की चौधराहट का दौर पिछले लंबे समय से चलता आया है। सूबे के इतिहास में कई मिसालें ऐसी भी सामने आई है जिनमें कि यह देखने को मिला है कि किसी सरकार को गर्त में ले जाने में ऐसे ही घुन अफसरों ने मुख्य भूमिका निभाई है। अब यह इतना आसान तो है नहीं कि कोई अफसर खुद के बूते से इतने बड़े षड़यंत्र को अंजाम दे दे। ऐसे समय में उनकी मदद करने के लिए चंद कलमवीर, जोकि खुद को दिग्गज कहलाते है, वे मैदान में कूद जाते है। खुद पत्रकारिता के बहुबली कहने वाले यह कलमवीर हमेशा इसी बात की शेखी बघारते है कि शासन प्रशासन तो उनकी जेब में रहता है और उनके मर्जी के बिना कोई मंत्री या अधिकारी किसी बात का निर्णय नहीं लेता। घुन रूपी अफसरों और इन चंद कलमवीरों की जुगलबंदी गेहूं जैसी सरकार को गर्त में ले जाने की दिशा में प्रत्येक कदम सोच समझ कर उठाते रहते है। यह वहीं अफसर है जिनकी वजह से समूची नौकरशाही को लोग संदेह की नजरों से देखते है। शासन-प्रशासन में कुछ ईमानदार अफसर ऐसे भी जोकि इन घुन रूपी अफसरों की करतूत को देखकर या तो समय से पहले रिटायर हो जाते है या फिर इनसे दूरी बनाने के लिए प्रतिनियुक्ति पर राज्य से बाहर चले जाते है। उत्तराखण्ड में मौजूदा सरकार बहुत ही अच्छा काम कर रही है और उसके इन कार्यों का लोहा समूचा देश मान रहा है और उत्तराखण्ड सरकार के कार्यों से प्रेरित हो रहा है। सरकार के यह उपलब्धि सदा बनी रहे इसके लिए सरकार को स्वयं मंथन करना होगा कि यदि ऐसे घुन रूप अफसर और कुछ विश्वासघाती कलमवीर अगर अपनी योजनाओं को धरातल पर उतारने में कामयाब हो गए तो सरकार की उपलब्धियों पर ग्रहण लगते देर नहीं लगेगी?
उत्तराखण्ड की नौकरशाही में कई अफसर ऐसे हैं जो एक लंबे समय से कुछ ऐसे पदों पर आसीन है जोकि उनके लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रहे है। ऐसे अफसरों का जलवा कुछ ऐसा है कि वह जब किसी ऐसी कुर्सी जहां से उनकी सरकारी कमाई के साथ साथ कथित गैर सरकारी कमाई के स्रोत खुल जाते है तो वह समयावधि पूरी होने के बाद भी उस कुर्सी से हटने को तैयार नहीं होते। साम, दंड भेद की नीति को अपनाते हुए यह अफसर इसी कोशिश में लगे रहते है कि चाहे जो भी हो जाए, उनकी कुर्सी उनसे नहीं छूटनी चाहिए। अपनी इस मंशा को पूरा करने के लिए वह चंद कलमवीरों को अपना राजदार बनाने से भी गुरेज नहीं करते हैं। यह कलमवीर वो होते है जिनका धैय मात्र यही होता है कि ‘‘रामनाम जपना, पराया माल अपना…….!’’ ऐसे अफसरों और कलमवीरों के कॉकस की करतूतों से ही उत्तराखण्ड में कई बार सरकारें अस्थिर हुई हैं जोकि इस राज्य के इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उत्तराखण्ड की मौजूदा सरकार कई मायनों में पिछली सरकारों से बेहतर काम कर रही है। इसकी बानगी कई मायनों में देखी जा सकती है। हालांकि इस बात की सुगबुगाहट तो अब इस सरकार के गलियारों में होने लगी है कि घुन रूप अफसरों और उनके घनिष्ठ कलमवीरों को कॉकस एक बार फिर एक्टिव हो गया है और वह इस कोशिश में लगा हुआ है कि कैसे वह गुड गवर्नेंस देने वाली इस सरकार की छवि का धूमिल करें? अब देखना वाली बात यह होगी कि ऐसे अफसरों और कलमवीरों की कारसतानी की गूंज सरकार के आकाओं के कानों में कब गूंजेगी और वे सरकार की छवि को धूमिल करने वाले इन अफसरों और कलमवीरों पर कब और कैसे नकेल कसेंगे?

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