सट्टेबाजों पर है व्यापारी की आत्महत्या का दाग?

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पुलिस हाकिम इंसान की मौत हुई है न कि जानवर की!
आत्महत्या का सच बाहर लाने को क्यों नहीं करा रहे जांच
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। पुलिस हाकिम चंद रोज पूर्व इदगाह निवासी एक व्यापारी ने खुद को गोली मारकर इसलिए मौत चुनी थी क्योंकि उसके सिर पर क्रिकेट सट्टा खेलने के कारण लगभग ढाई करोड रूपये का कर्ज हो गया था और जब वह इस कर्ज को नहीं चुका रहा था तो सट्टेबाजों की धमकियों से व्यापारी अपने आपको डरा हुआ महसूस कर रहा था और उसने समाज में अपनी बेइज्जती से बचने के लिए आकाल मृत्यु को चुना लेकिन सवाल यह है कि जब परिवार का एक सदस्य मरता है तो पूरे परिवार को जीवन भर रोजी रोटी के लिए मरना पडता है? राजधानी के अन्दर यह सवाल भी खडे हो रहे हैं कि आखिर आत्महत्या का सच बाहर लाने के लिए पुलिस हाकिम क्यों आगे नहीं आना चाहते क्योंकि सट्टेबाजों के आतंक से एक इसंान की मौत हुई है न कि किसी जानवर की? शहर के अन्दर मृतक व्यापारी को जानने वाले कबूल रहे हैं कि व्यापारी ने सट्टेबाजी के कर्ज के बोझ में दबने के कारण आत्महत्या की थी और इस आत्महत्या का दाग सट्टेबाजों के सिर पर है? गजब बात यह है कि एक व्यापारी की मौत की जांच का सच बाहर लाने के लिए पुलिस को कोई युद्ध नहीं लडना बल्कि मृतक व्यापारी के मोबाइल फोन की सीडीआर से ही उसकी मौत का राज बेनकाब हो सकता है लेकिन इसके लिए भी अगर पुलिस हाकिम आगे नहीं आ रहे तो फिर ऐसी पुलिस को कौन मित्र पुलिस कहेगा?
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व इदगाह निवासी प्रवीन गिरोटी ने अपनी लाइसेंसी पिस्टल से खुद को गोली मारकर हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया था। व्यापारी की मौत के बाद पुलिस ने दम भरा था कि उस पर कर्ज हो रखा था जिसके चलते उसने आत्महत्या की है लेकिन पुलिस की इस कहानी को शहर के वो लोग जो मृतक व्यापारी को वर्षों से जानते थे उनका साफ कहना है कि व्यापार के कर्ज से नहीं बल्कि सट्टेबाजी के लगभग ढाई करोड के कर्ज में डूबने के कारण व्यापारी ने आत्महत्या की? कुछ लोगों का कहना था कि कुछ सट्टेबाज व्यापारी से पैसे मांगने के लिए उसे आये दिन आतंकित कर रहे थे और इतने पैसे वह चुकाने में लम्बे समय तक सक्षम नहीं दिख रहा था जिसके चलते उसने अपनी जीवनलीला को ही इन सट्टेबाजों के आतंक और भय के चलते समाप्त कर ली थी? सट्टेबाजों का यह तांडव रोकने के लिए कब राजधानी के पुलिस हाकिम अपना तीसरा नेत्र खोलेंगे यह तो अभी एक रहस्य ही बना हुआ है लेकिन जिस तरह से एसटीएफ ने एक सफेदपोश कपडा व्यापारी को सट्टे के धंधे में दबोचा और उसके मोबाइल फोन में लेनदेन का जो लाखांे का हिसाब किताब उसके सामने आया उससे यह तो स्पष्ट हो गया कि राजधानी में काफी सफेदपोश और सट्टेबाजों का सिंडिकेट कुछ खाकीधारियों के साथ गठबंधन कर उन्हें अपनी खुली पनाह दिये हुये हैं? सट्टेबाजों का नेटवर्क इतना अभेद हो चुका है कि उन्हें पुलिस की रणनीति के बारे में पहले ही पता चल जाता है जिसके चलते उन्होंने अपने आपको सेफ जोन में रखने के लिए दो महिलाओं को अपनी ढाल बनाकर उन्हें सट्टे के पैसे के लेनदेन का टास्क सौंपा हुआ है? चर्चा यहां तक है कि सट्टेबाजों का दुलारा गुल्ली डंडा सुबह से शाम तक क्रिकेट और मटके सट्टे का पैसा दुपहिया वाहन पर एकत्र करने के लिए शहरभर मंे निकल जाता है और उसके बाद वह पैसा बिंदाल पुल के समीप एक जगमग दिखाई देने वाली दुकान में जाकर वह जमा करा आता है और यह खेल लम्बे समय से गुल्ली डंडा खेलता आ रहा है? राजधानी के अन्दर लम्बे अर्से से सट्टेबाजों का गैंग दीमक की तरह काफी व्यापारी और युवा पीढी को खोखला करता आ रहा है और काफी व्यापारी इसका पूर्व में शिकार भी हो चुके हैं इसलिए नासूर की तरह पनप रहे क्रिकेट और मटके के सट्टे पर आखिर कौन पुलिस का अफसर बडा प्रहार करने के लिए मैदान में आयेगा यह देखने वाली बात होगी?

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