‘गुल्ली-डंडा’ मैच खेलने वालों से सुबह ही जमा करा लेता है दौलत
मटके सट्टे का भी बादशाह है शहर का सट्टाकिंग
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का इतिहास गवाह है कि अधिकांश जिलों में तैनात होने वाले पुलिस कप्तान शुरूआती दौर मंे ही अपनी समूची टीम को गैर कानूनी धंधे करने वालों पर नकेल लगाने का फरमान देते रहे हैं और उनका सबसे ज्यादा ध्यान क्रिकेट और मटके का सट्टा करने वाले सट्टेबाजों पर रहता था जिसके चलते अगर कुछ जिलों में नये पुलिस कप्तान की तैनाती के बाद सट्टेबाजों के खिलाफ ऑपरेशन चलाकर छोटे मोटे सटोरियों को दबोच लिया जाता था। अब राजधानी में नये पुलिस कप्तान को जिला संभाले कुछ माह हो गये हैं और उन्हांेने जिस तरह से दावा किया था कि गैर कानूनी धंधे करने वालों पर गैंगेस्टर लगाई जायेगी और उनकी हिस्ट्रीशीट खोली जायेगी तो धंधेबाजों में एक बडा डर चंद दिनों तक तो देखने को मिला था लेकिन अचानक क्रिकेट सट्टेबाजांे, मटके सट्टेबाजों और खनन माफियाओं में पुलिस का तिनकाभर भी डर देखने को नहीं मिल रहा है जिसके चलते सट्टे के बादशाह बने किंग अपने काले कारोबार को बिना किसी डर के अंजाम दे रहे हैं। हैरानी वाली बात है कि शहर में एक सट्टेबाज अपने परिवार के साथ जहां क्रिकेट सट्टे का किंग बना हुआ है वहीं वह मटके सट्टे का भी वर्षों से बादशाह कहलाता है और इस बादशाह का एक प्यारा ‘गुल्ली-डंडा’ अपने आका के लिए सुबह से रात तक गाडी पर क्रिकेट का सट्टा खेलने वालों से रूपये जमा कराने के मिशन में आगे रहता है। सट्टाकिंग के परिवार का प्यारा यह ‘गुल्ली-डंडा’ राजधानी के हर सट्टेबाज और सट्टा खेलने वालों का हमराज है लेकिन सट्टाकिंग का प्यारा होने के कारण वह भी खाकी सेे भय नहीं खाता और क्रिकेट और मटके सट्टे की अधिकांश वसूली इसी के द्वारा किये जाने की चर्चाएं हमेशा आम रहती हैं?
राजधानी के अन्दर कैंसर की बीमारी की तरह फैल चुके क्रिकेट और मटका सट्टे के मकडजाल में फंसकर काफी व्यापारी और युवा पीढी बर्बादी की राह पर आ चुकी है और कैंसर की तरह फैल रहे सट्टे का धंधा दर्जनों सफेदपोशों को भी रास आ चुका है और इसी के चलते वह शॉटकट से अकूत दौलत कमाने के मिशन में रात-दिन आगे बढते जा रहे हैं? कमाल की बात है कि राजधानी के पुलिस हाकिम को सट्टेबाजों का नेटवर्क भेदने में अभी तक कोई दिलचस्पी पैदा क्यांे नहीं हुई यह तो हैरान करने जैसा है ही लेकिन अगर पुलिस के कुछ लोग सट्टेबाजों के साथ गठबंधन कर अपने काले धंधे को बिना किसी डर के अंजाम दे रहे हैं तो उससे सवाल उठ रहा है कि क्या राजधानी में क्रिकेट और मटके का सट्टा करना कोई अपराध नहीं रह गया है? अगर मटके का सट्टा कोई अपराध नहीं है तो फिर पुलिस के कुछ लोग क्यों छुटभैयों को कलम, पर्ची और काफी के साथ मात्र कुछ रूपयों में दबोचकर उनका तमाशा बना रहे हैं? राजधानी में दर्जनों बडे-बडे सट्टाकिंग हैं जो कुछ फ्लैटों, होटल के कमरों से अपने इस धंधे को खुलकर अंजाम दे रहे हैं और सबकुछ जानते हुए भी पुलिस के कुछ अफसर इस गुनाह को करने वालों पर अपनी कृपा बनायें हुये हैं जिससे उनकी निष्ठा पर सवालिया निशान लग रहे हैं? क्रिकेट मैचों को खिलाने वाला एक सट्टेबाज का सिंडिकेट मटके का सट्टा खिलाने का भी बडा बादशाह है और इस बादशाहत मंे उसका कोई सानी राजधानी में नजर नहीं आता? सट्टेबाज के परिवार ने वसूली के खेल के लिए एक ‘गुल्ली-डंडा’ अपना दुलारा बना रखा है और यह ‘गुल्ली-डंडा’ सिंडिकेट के लिए सुबह से रात तक सट्टा खेलने वाले खिलाडियों से पैसे की वसूली कर अपने आका के पास पहुंच जाता है। चर्चा है कि यह ‘गुल्ली-डंडा’ राजधानी में सभी बडे क्रिकेट सट्टेबाजों और मटके का सट्टा खेलने वालों का बडा हमराज है और अकसर पुलिस के कुछ कर्मचारियों के साथ वह शहर की सडकों पर हसी ठहाके लगाते हुए भी देखा गया है ऐसे में देखने वाली बात होगी कि कब पुलिस हाकिम को क्रिकेट और मटका सट्टेबाजों को जमीन से खोदकर निकालने के लिए गुस्सा आयेगा जो कि अभी तक आता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है?