पत्रकार को भी सट्टेबाजी का मिल गया लाइसेंस!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। राजधानी में पुलिस हाकिम सट्टेबाजों के सिंडिकेट के इकबाल से क्यों घबराये हुये नजर आ रहे हैं यह हैरान करने जैसा ही नजर आ रहा है? सट्टेबाजों का सिंडिकेट युवा पीढी और काफी व्यापारियों को क्रिकेट के सट्टे का चस्का लगाकर उन्हें बर्बादी के द्वार पर लाकर खडा करता आ रहा है जिसके चलते उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट आकर खडा हो गया है लेकिन इसके बावजूद भी राजधानी के पुलिस हाकिम को ऐसे सट्टेबाजों पर क्यों क्रोध नहीं आ रहा है इसका जवाब तो शायद पुलिस हाकिम के पास ही होगा? गजब की बात है कि पुलिस मुख्यालय के समीप के एक कॉम्पलैक्स से एक कलमवीर क्रिकेट का सट्टा खिला रहा है और उसका नेटवर्क भेदने में एसटीएफ, एसओजी और दून पुलिस भी नाकाम दिखाई दे रही है जिससे यह सवाल खडे हो रहे हैं कि क्या राजधानी में सफेदपोशों की तरह पत्रकार को भी सट्टेबाजी का लाइसेंस मिल गया है जिसके चलते वह अपने इस काले कारोबार को बिना किसी डर के अंजाम देने में लगा हुआ है? राजधानी में कुछ दबे कुचलों को सट्टे में दबोचकर पुलिस क्या दिखाना चाह रही है कि वह सट्टेबाजों के खिलाफ ऑपरेशन चला रही है? बडे-बडे सट्टेबाजों के सिंडिकेट को सट्टे के लिए मिल रही खुली आजादी यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या अब राजधानी में सट्टेबाजी करना कोई गुनाह नहीं है?
पुलिस मुख्यालय के चंद अफसर अकसर गैर कानूनी धंधे करने वालों पर शिकंजा कसने का फरमान जारी करते रहते हैं और इस फरमान के बाद कुछ छोटे मोटों पर पुलिस की कार्यवाही हमेशा देखने को मिलती रही है। हालांकि पिछले लम्बे समय से राजधानी में क्रिकेट सट्टेबाजों और जुए के बडे अड्डे चलाने वाले कुछ दबंगों पर पुलिस अफसरों की रहस्यमय चुप्पी कई सवालों को जन्म देती आ रही है? हैरानी वाली बात है कि कुछ क्रिकेट सट्टाकिंग इस धंधे को तो अंजाम दे ही रहे हैं इसके साथ ही वह कुछ राज्यों के बडे जुआरियों को बुलाकर उन्हें होटल के किसी कमरे में जुआ खिलाने के लिए आमंत्रित करते हैं और वहां लाखों का जुआ चलता है और यह जुए के अड्डे वही क्रिकेट सट्टाकिंग चला रहा है जो हनुमान चौक के एक बडे व्यापारी के साथ क्रिकेट सट्टे का बडा खेल खिलाता है? एक ओर तो गैर कानूनी काम करने वालों पर गैंगेस्टर और उनकी हिस्ट्रीशीट खोलने का दम भरा जा रहा है वहीं क्रिकेट और जुए के बडे अड्डे चलाने वालों पर पुलिस के कुछ अफसरों की खामोशी ने अब कई सवाल खडे करने शुरू कर दिये हैं? क्रिकेट सट्टेबाजों के हौसले कितने बुलंद हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक नाम मात्र के लिए पत्रकारिता का चोला ओढने वाला कलमवीर पुलिस मुख्यालय के समीप एक कॉम्पलैक्स से अपने क्रिकेट सट्टा खिलाने का काला धंधा कर रहा है और इस काले धंधे की गूंज कैसे एसटीएफ, एसओजी और दून पुलिस को सुनाई नहीं दे रही यह तो गजब की बात है? अगर नासूर की तरह फैल रहे क्रिकेट सट्टे और जुए के अड्डों पर पुलिस प्रहार करने का साहस नहीं दिखा रही तो उससे इस बात को भी कहीं न कहीं एक बडा बल मिल रहा है कि पुलिस के कुछ दरोगाओं और क्रिकेट और जुए के अड्डे चलाने वाले सिंडिकेट के बीच कितना बडा गठबंधन हो रखा है? ‘याईम स्टोरीÓ की सिर्फ एक सोच है कि इस काले कारोबार के मकडजाल में फंसे लोगों को किसी तरह से सट्टेबाजों के चंगुल से उन्हें बाहर निकाला जाये क्योंकि काफी युवा पीढी और काफी व्यापारी शॉटकट से दौलत कमाने की चाहत में बर्बादी के द्वार पर आकर खडे हो गये हैं और कुछ मौत को गले लगाने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं क्योंकि क्रिकेट सट्टेबाज उनसे पैसा वसूलने के लिए उन्हें अपने बाहुबली होने का डर दिखाकर उनसे अपना कर्ज लेने के लिए उन्हें आतंकित करते आ रहे हैं? ऐसे में पुलिस का कौन अफसर मसीहा बनकर सामने आयेगा जो क्रिकेट सट्टेबाजों और जुए के अड्डे चलाने वालों की नाक में नकेल डाल सके?

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