देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड में बाइस सालों से ढोल पीटा जा रहा है कि राज्य में भ्रष्टाचारमुक्त सरकार चलेगी लेकिन राज्य में कुछ पूर्व सीएम के कार्यकाल में सरकार ने अपनी दशा और दिशा को सही रूप देने के बजाए उसे अहंकार का पैमाना माना तो उससे कुछ सीएम हमेशा आवाम के निशाने पर रहे? हैरानी वाली बात है कि कुछ सरकार अपने आंगन में मीडिया सलाहकार की ताजपोशी करती रही और यह मीडिया सलाहकार अहंकार पालकर सरकार व कुछ मीडियाकर्मियों के बीच इतनी बडी दूरी बनाते चले गये कि उससे कुछ सीएम को यही नहीं पता चला कि वह जिस मीडिया सलाहकार की सलाह पर कुछ मीडियाकर्मियों को अपने से दूर रख रहे हैं वह मीडिया सलाहकार उनकी कुर्सी डूबोने का ही काम कर रहा है? चंद सीएम के मीडिया सलाहकार इतने अहंकारी रहे कि उन्होंने कुछ मीडियाकर्मियों के खिलाफ अपराधिक मुकदमें दर्ज करवाये और अपने आपको बाहुबली मीडिया सलाहकार साबित करने के लिए वह इतनी उडान भरने लगे कि उनकी उडान इतनी घातक हुई कि दो पूर्व सीएम की कुर्सी ही हमेशा के लिए उनसे छीन गई थी? सरकार के आंगन में हमेशा कलमवीर की तैनाती घातक होती है क्योंकि यह कलमवीर अपने चुनिंदा मीडियाकर्मियों को सरकार के मुखिया के सामने उनका रूप इस कदर बढाते हैं कि उनसे बडा कलमवीर इस राज्य में नहीं है और जो मीडियाकर्मी सरकार के आंगन में पलने वाले चापलूस और धमंड में चूर कलमवीर की चाश्नी चाटने से इंकार कर देता है तो उसे यह कलमवीर सरकार के मुखिया की नजरों में ऐसे विलेन बना देते हैं मानो वह मीडियाकर्मी कितना बडा खलनायक होगा? सरकार ने भले ही अपने दूसरे कार्यकाल में मीडियाकर्मियों को अपने से दूर किया हो लेकिन एक कलमवीर को गुमान है कि वह सरकार के साथ है और सरकार उसके पूछे बिना कुछ नहीं करेगी? अगर कलमवीर का यह दावा सच है तो फिर उत्तराखण्ड के इतिहास को भी याद रखना चाहिए कि पूर्व में ऐसे कलमवीर सरकार के लिए कितने बडे घातक बने थे?
उल्लेखनीय है कि सरकार के आंगन में किसी मीडिया सलाहकार की आखिर जरूरत क्यों होती है? सरकार के पास अपना लम्बाचौडा सूचना विभाग मौजूद है और मीडिया से संवाद के लिए सूचना सचिव और सूचना महानिदेशक तैनात होते हैं जो हमेशा मीडिया और सरकार के बीच एक बडा संवाद बनाते हुए दिखाई देते आ रहे हैं लेकिन कुछ सरकारों में सूचना सचिव और सूचना महानिदेशक से बडा मीडिया सलाहकार क्यों होता रहा यह किसी की समझ में नहीं आया और यही कारण रहा कि कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में ऐसे मीडिया सलाहकार मुख्यमंत्री को कुछ मीडियाकर्मियों के बारे में ऐसा दृश्य दिखाते रहे हैं कि उसके चलते मीडियाकर्मियों और सरकार के मुखिया के बीच इतनी बडी खाई पैदा होती रही कि उसकी गूंज उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक में गूंजती रही? कांग्रेस शासनकाल में भी दो मीडिया सलाहकार मुख्यमंत्री और मीडियाकर्मियों के बीच इतनी बडी खाई पैदा करते रहे कि वो खाई पाटने की कभी भी कोशिश नहीं हुई और उसके चलते पूर्व मुख्यमंत्री को इसका खामियाजा भी भुगतना पडा था? वहीं त्रिवेन्द्र रावत ने अपने शासनकाल में मीडिया सलाहकार के रूप में रमेश भट्ट और मीडिया कोडिनेटर के रूप में दर्शन सिंह रावत को यह सोचकर तैनात किया था कि वह सरकार और मीडिया के बीच सेतु का काम करेंगे लेकिन इन दोनो पदाधिकारियों ने धमंड के सागर में गोते लगाते हुए मुख्यमंत्री और कुछ मीडियाकर्मियों के बीच इतनी खाई पैदा कर दी थी कि उसका अंदाजा भी त्रिवेन्द्र रावत को नहीं चल पाया था। सबसे अह्म बात यह है कि जब भी कोई मीडिया सलाहकार या मीडिया कोडिनेटर बनाया जाता है तो वह अपनी पसंद के कुछ मीडियाकर्मियों को ही राज्य का मीडिया मानकर उन्हें सरकार के आंगन में ले जाती है और उन मीडियाकर्मियों को सरकार के मुखिया से दूर कर दिया जाता है जो अपनी लेखनी से ऐसे चाटुकार मीडिया सलाहकारों की चाश्नी में डूबने से इंकार कर देते हैं। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी पहली पारी में एक दो मीडियाकर्मियों की तैनाती की थी लेकिन दूसरी पारी में उन्होंने अपनी टीम में किसी भी मीडियाकर्मी को शामिल नहीं किया है फिर भी एक कलमवीर मीडिया में यह भौकाल दिखा रहा है कि भले ही उसकी सरकार में तैनाती नहीं हुई हो लेकिन वह सरकार के साथ है और यह कलमवीर भी शायद उसी राह पर आगे बढने की चाहत में है जैसे कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में उनके मीडिया सलाहकार किया करते थे? चर्चाओं का बाजार गर्म है कि यह कलमवीर कुछ अपने मीडिया संगियों को अपनी ढाल बनाकर उन्हें सरकार के पास संदेश दिलाने की कोशिश में जुट गया है कि कौन मीडिया सरकार के आंगन में आना चाहिए और कौन नहीं?