भू कानून के लिए गठित कमेटी ने मुख्यमंत्री को सौंपी रिपोर्ट

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देहरादून(संवाददता)। भू कानून के लिए गठित पांच सदस्यीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट आज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौप दी है। रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि हमारी सरकार उत्तराखण्ड की देवतुल्य जनता के हित में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस अवसर पर भू-कानून से संबंधित हम सभी पक्षों की राय लेते हुए प्रदेश के विकास व प्रदेशवासियों के कल्याण के लिए निर्णय लेंगे।
इस अवसर पर आपको बता दें कि भू कानून समिति में अध्यक्ष समेत कुल पांच सदस्य हैं। इसमें समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार हैं। सदस्य के तौर पर दो रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डी एस गब्र्याल और अरुण कुमार ढौंडियाल शामिल हैं। डेमोग्राफिक चेंज होने की शिकायत करने वाले अजेंद्र अजय भी इसके सदस्य हैं। उधर, सदस्य सचिव के रूप में राजस्व सचिव आनंद वर्धन फिलहाल इस समिति में हैं। उम्मीद की जा रही है कि समिति की तरफ से जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी गयी है, उसमें हिमाचल के कानून की भी कुछ झलक दिख सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तराखंड में नए कानून को हिमाचल की तर्ज पर बनाए जाने की मांग उठती रही है। रिपोर्ट में समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार हिमाचल से ही ताल्लुक रखते हैं। यही नहीं, इस समिति की तरफ से हिमाचल के भू-कानून का अध्ययन किया गया है। समिति की तरफ से इस कानून के लिए मांगे गए सुझावों में करीब 2०० सुझाव मिले थे। इनमें अधिकतर में उत्तराखंड की तरह ही भौगोलिक परिस्थितियां होने के कारण हिमाचल के भू कानून को प्रदेश में लागू करने के सुझाव मिले थे।
इस अवसर पर रिपोर्ट में बताया गया कि जुलाई 2०21 में सीएम धामी ने उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। सीएम धामी ने जुलाई 2०21 में प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद उसी वर्ष अगस्त माह में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। समिति को राज्य में औद्योगिक विकास कार्यों हेतु भूमि की आवश्यकता तथा राज्य में उपलब्ध भूमि के संरक्षण के मध्य संतुलन को ध्यान में रख कर विकास कार्य प्रभावित न हों, इसको दृष्टिगत रखते हुए विचार विमर्श कर अपनी संस्तुति सरकार को सौंपनी थी। रिपोर्ट में कहा गया कि समिति ने राज्य के हितबद्ध पक्षकारों, विभिन्न संगठनों, संस्थाओं से सुझाव आमंत्रित कर गहन विचार विमर्श कर लगभग 8० पृष्ठों में अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इसके अलावा समिति ने सभी जिलाधिकारियों से प्रदेश में अब तक दी गई भूमि क्रय की स्वीकृतियों का विवरण मांग कर उनका परीक्षण भी किया। रिपोर्ट में राज्य में निवेश और रोजगार बढाने के साथ भूमि के दुरूपयोग को रोकने पर फोकस – समिति ने अपनी संस्तुतियों में ऐसे बिंदुओं को सम्मिलित किया है जिससे राज्य में विकास के लिए निवेश बढ़े और रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। रिपोर्ट में कहा गया कि साथ ही भूमि का अनावश्यक दुरूपयोग रोकने की भी अनुशंसा की है। समिति ने वर्तमान में प्रदेश में प्रचलित उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 195०) यथा संशोधित और यथा प्रवृत्त में जन भावनाओं के अनुरूप हिमाचल प्रदेश की तरह कतिपय प्रावधानों की संस्तुति की है।
रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान में जिलाधिकारी द्वारा कृषि अथवा औद्यानिक प्रयोजन हेतु कृषि भूमि क्रय करने की अनुमति दी जाती है। कतिपय प्रकरणों में ऐसी अनुमति का उपयोग कृषिध्औद्यानिक प्रयोजन न करके रिसोर्टध् निजी बंगले बनाकर दुरुपयोग हो रहा है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में लोग भूमिहीन हो रहें और रोजगार सृजन भी नहीं हो रहा है। रिपोर्ट में समिति ने संस्तुति की है कि ऐसी अनुमतियां जिलाधिकारी स्तर से न दी जाऐं। शासन से ही अनुमति का प्रावधान हो। वर्तमान में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों हेतु भूमि क्रय करने की अनुमति जिलाधिकारी द्वारा प्रदान की जा रही है। हिमांचल प्रदेश की भाँति ही ये अनुमतियाँ, शासन स्तर से न्यूनतम भूमि की आवश्यकता के आधार पर, प्राप्त की जाएं। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान में राज्य सरकार पर्वतीय एवं मैदानी में औद्योगिक प्रयोजनों, आयुष, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, उद्यान एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, कृषि के लिए 12.०5 एकड़ से ज्यादा भूमि आवेदक संस्था, फर्म, कम्पनी, व्यक्ति को उसके आवेदन पर दे सकती है। उपरोक्त प्रचलित व्यवस्था को समाप्त करते हुए हिमाचल प्रदेश की भांति न्यूनतम भूमि आवश्यकता अनिवार्यता प्रमाण पत्र के आधार पर दिया जाना उचित होगा। रिपोर्ट में कहा गया कि केवल बड़े उद्योगों के अतिरिक्त 4-5 सितारा होटल, रिसॉर्ट, मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, वोकेशनल, प्रोफेशनल इंस्टिट्यूट आदि को ही अनिवार्यता प्रमाण पत्र के आधार भूमि क्रय करने की अनुमति शासन स्तर से दी जाए। अन्य प्रयोजनों हेतु लीज पर ही भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था लाने की समिति संस्तुति करती है। वर्तमान में, गैर कृषि प्रयोजन हेतु खरीदी गई भूमि को 1० दिन में ै.क्.ड. धारा- 143 के अंतर्गत गैर कृषि घोषित करते हुए खतौनी में दर्ज करेगा। परन्तु क्रय अनुमति आदेश में 2 वर्ष में भूमि का उपयोग निर्धारित प्रयोजन में करने की शर्त रहती है।
रिपोर्ट में कहा गया कि यदि निर्धारित अवधि में उपयोग ना करने पर या किसी अन्य उपयोग में लानेध्विक्रय करने पर राज्य सरकार में भूमि निहित की जाएगी, यह भी शर्त में उल्लखित रहता है। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि 1० दिन में गैर कृषि प्रयोजन हेतु क्रय की गई कृषि भूमि को ष्गैर कृषिष् घोषित कर दिया जाता है, तो फिर यह धारा-167 के अंतर्गत राज्य सरकार में (उल्लंघन की स्थिति में) निहित नहीं की जा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया कि अत: नई उपधारा जोङते हुए उक्त भूमि को पुन: कृषि भूमि घोषित करना होगा तत्पश्चात उसे राज्य सरकार में निहित किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि कोई व्यक्ति स्वयं या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के नाम बिना अनुमति के अपने जीवनकाल में अधिकतम 25० वर्ग मीटर भूमि आवासीय प्रयोजन हेतु खरीद सकता है । रिपोर्ट में समिति की संस्तुति है कि परिवार के सभी सदस्यों के नाम से अलग अलग भूमि खरीद पर रोक लगाने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड राजस्व अभिलेख से लिंक कर दिया जाए। राज्य सरकार भूमिहीन को अधिनियम में परिभाषित करे।

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