धामी बने राजनीतिक के बाजीगर

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देहरादून(प्रमुख संवाददाता)। उत्तराखंड में बीजेपी की दो तिहाई बहुमत से हुई जीत तो हुई लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की हार ने इस जीत को बेस्वाद कर दिया। हार कर भी जीत जाने वाले को बाजीगर कहते है,कुछ इसी तरह से धामी के साथ हुआ और उन्हें अब बाजीगर ही कहा जाने लगा है। वो खुद चुनाव हार गए लेकिन बीजेपी को हार के मुंह से जीत की दहलीज तक ले गए। धामी चुनाव से पहले अपनी विधानसभा की चिंता छोड़ कर अन्य 69 सीटो को जिताने के लिए मेहनत करते रहे और इसका परिणाम ये हुआ कि वो अपनी ही सीट को गंवा बैठे। राजनीति के बाजीगर पुष्कर सिंह धामी ने मात्र छह माह के भीतर कांग्रेस के हाथ में आ रखी सत्ता को जिस तरह से छीन कर भाजपा की झोली में डाल दिया उसको देखते हुए भाजपा हाईकमान पुष्कर सिंह धामी की सफल राजनीति का कायल हो रखा है और राज्यभर मे एक ही मांग चल रही है कि हमारा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जैसा हो। चुनाव से छह माह पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त ये ही कयास लगाए जारहे थे कि क्या पुष्कर धामी बीजेपी को दोबारा सत्ता दिला पाएंगे? उस वक्त ये भी मिथक था कि उत्तराखंड में पांच साल बीजेपी पांच साल कांग्रेस की सरकार रहती है। मिथक एक ये भी था कि मुख्यमंत्री उत्तराखंड में चुनाव हारते है। धामी पिछला विधानसभा चुनाव करीब दो हजार वोट से जीते थे, इस बार तम्माम सर्वे ने उनकी सीट पर भी हार का अंदेशा पहले ही जताया हुआ था इसके बावजूद  वो अपनी खटीमा विधानसभा छोड़ कर राज्य की अन्य सीटो को जीतने के लिए रात दिन मेहनत करते दिखाई दिए वो अपने छह माह के कार्यकाल में रोज तीन विधानसभा क्षेत्रों में जाकर बीजेपी के लिए अनुकूल चुनाव माहौल बनाते रहे। धामी ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए खटीमा में अपनी चुनाव तैयारियो को समय कम दिया उनकी पत्नी ने उनका साथ दिया और घर घर जाकर वोट मांगे। धामी को ये विश्वास था कि उन्हें क्षेत्र में रहने वाली थारू जनजाति उन्हें जरूर समर्थन देगी लेकिन ये खटीमा का दुर्भाग्य कहें कि वो कांग्रेस के साथ चली गयी और श्री धामी चुनाव हार गए। धामी चुनाव हार कर भी प्रदेश की जनता की नजरों में जीत गए क्योंकि उत्तराखंड की जनता ने मोदी धामी की सरकार में ही विश्वास करके वोट दिया है। बीजेपी के उत्तराखंड राज्य चुनाव प्रभारी प्रह्लाद जोशी, संगठन प्रभारी दुष्यंत गौतम और महामंत्री कैलाश विजय वर्गीय ने भी चुनावो की जीत के लिए धामी की मेहनत को सराहा। बीजेपी के प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट ने कहा कभी कभी टीम मैच जीत जाती है किंतु कैप्टन जीरो पर आउट होजाता है इसका अर्थ ये नही कि उनके एफर्ट में कोई कमी थी ये जीत सबकी सामूहिक जीत है। धामी ही फिर से मुख्यमंत्री बने और इसके लिए कपकोट विधायक सुरेश गडिय़ा और चम्पावत के विधायक कैलाश गहतोड़ी ने इस्तीफा देने की पेशकश की है। अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? ये निर्णय बीजेपी के हाई कमान को करना है, यदि विधायको में से नया नेता चुनने की परंपरा निभाई गयी तो चेहरा कोई और होगा और यदि हाई कमान ने किसी अन्य विकल्प पर विचार किया तो धामी के हाथ फिर से उत्तराखंड सरकार की कमान हो सकती है।

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