जीत का समुन्दर कैसे पार करेंगे तीरथ?

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देहरादून(मुख्य संवाददाता)। उत्तराखण्ड में प्रचंड बहुमत की सरकार अगर खुफिया एजेंसियों से गोपनीय सर्वे कराकर 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का पलडा किस ओर रहेगा अगर इसका आंकलन करा लें तो उसे मौजूदा दौर में आईना दिखाई देगा कि राज्य के अन्दर सरकार को लेकर आवाम के अन्दर कितनी बडी नाराजगी पनप रही है। ऐसी नाराजगी के बीच तीरथ सिंह रावत कैसे भाजपा को चुनावी समन्दर पार कर जीत दिला पायेंगे यह अब भाजपा व संघ के काफी बडे पदाधिकारियों के मन में एक बेचैनी पैदा कर चुका है? उत्तराखण्ड के अन्दर चार साल तक लोकतंत्र को दरकिनार कर जिस तरह से राजशाही अंदाज में त्रिवेन्द्र रावत ने सत्ता चलाई उसका खामियाजा कहीं न कहीं सरकार के नये मुखिया तीरथ सिंह को भुगतना पड सकता है? अगर तीरथ सिंह रावत राज्य के कुछ बडे दागी अफसरों में इसी तरह से उन्हें बडे पद पर आसीन करे रहे तो यह तय है कि आवाम के बीच इन अधिकारियों को लेकर पनप रही नाराजगी 2022 के चुनाव में एक नया गुल खिला सकती है?
राज्य में कोरोना की हलचल कम तो हुई लेकिन 2022 के चुनावों की सुगबुहाहट अंदर ही अंदर शुरू हो गई है। जिस ढंग से राज्य में तीरथ सिंह रावत की सरकार चल रही है, उस पर भी एकाएक ब्रैक लग सकते है? इस बार तो प्रभु राम भी वैतरणी पार लगा पायेंगे यह भी सम्भव नजर नहीं आ रहा है? राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार व कोविड के समय जनता मे मची त्राहिमाम किसी से छिपी नहीं है, विपक्ष जहाँ विफल सरकार को जनता के बीच ले जाकर मुद्दा बना रहा है तो वही आप भी युवा शक्ति की बदौलत लोगों के दर्द को कम करने में लगे है। संघ व भाजपा बंगाल चुनावों की करारी हार से उभर नहीं पा रही है,वही छोटे से राज्य उत्तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है? कभी मंत्री नाराज तो कभी विधायक तो कभी अन्गर्ल बयानबाजी करते हुए सूबे के मुखिया से जनता परेशान हो रही है,तो राज्य के भ्रष्टाचार मे लिप्त नौकरशाह को सलाहकार बनाने पर सरकार आवाम के निशाने पर है? ऐसे में तीरथ 2022 में जनता के बीच कैसे चुनावी बिगुल बजायेंगे, उनके किचन कैबिनेट के सलाहकार ही बता सकते हैं?
2022 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता में कमल खिलेगा या पंजा या झाडू, लेकिन मुकाबला रोचक होने जा रहा है। त्रिवेंद्र से अवश्य कुर्सी खिसकी है, लेकिन अंदर ही अंदर वे अपने राजनीतिक रणनीतियों पर गहन चिंतन कर रहे है,चार सालों में स्वयं स्वास्थ्य महकमा संभाल चुके त्रिवेंद्र एकाएक आक्रमक बन गये है और जगह जगह रक्तदान शिविर लगाकर जनता की बीच बने हुए हैं,साथ ही तीरथ सरकार में भी वही दर्जनों नौकरशाह मलाई खा रहे है, जिनको बदलना तीरथ सिंह रावत को सत्ता संभालते ही बाहर का दरवाजा दिखा देना चाहिए था? राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण तीरथ का सौम्य चेहरा भी जनता को रिझाने में असफल ही रहा है। कुल मिलाकर तीरथ पर त्रिवेंद्र बीस ही साबित हो रहे है। ये अलग बात है कि राज्य में 2022 की कप्तानी कौन करेगा या बिना कप्तान के ही चुनाव लडा जायेगा यह वक्त ही तय करेगा। वही कोरोना व भ्रष्टाचार के मुद्दे को कांग्रेस को भुनाने के लिए एक अच्छा मौका था लेकिन ब्राह्मण वर्ण से इंदिरा ने तो प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिह व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के आपसी मनमुटाव के कारण कांग्रेस का बंटाधार हो रहा है? इस बार भी केदारनाथ विधायक मनोज रावत ही मैदान में पूरी ताकत झोंककर कांग्रेस व अपने को सिद्ध करने के लिए लगे है। वहीं केदारनाथ आपदा के बाद सुर्खियों में आये कर्नल कोठियाल ने भी दोनों दलो के दिलों की धडकनें तेज कर दी है। अपने युवा साथियों के साथ हर मोर्चे पर परिणामों को अपने पक्ष में करने की ललक तो है ही साथ ही भूतपूर्व सैनिकों के वोट बैंक पर भी सीधे ही सेंध लगा चुके हैं जो अभी तक भाजपा के पक्ष में जाता था वह अब आप में खिसकता नजर आ रहा है। आखिर मीडिया तो पक्ष विपक्ष को जगा ही सकती है,मैदान पर मोर्चा तो उन्हें व उनके कार्यकर्ताओं को ही खोदने है लेकिन भाजपा में जिस तरह से तीरथ मौन व हाशिये पर है,उस पर तीरथ व उनके शुभ चितको को ही मनन करना है?

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